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आधी सदी बाद कैसे होंगे भारत के शहर

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किसी परिचित जगह पर कुछ साल बाद जाओ तो एकबारगी सिर चकराना लाजिमी है। कोई भी ऐसी जगह जहां हमने लंबा वक्त बिताया हो ; या कोई ऐसा शहर या कस्बा, जिससे इतने समय तक वास्ता रहा हो कि वहां के गली-मोहल्लों से हम जान-पहचान बना पाए हों... ऐसी किसी जगह से फिर से रू-ब-रू होते ही हमारी हैरानी से लबालब प्रतिक्रियाएं कुछ इस तरह से होती हैं- ‘ अरे, कितना बदल गया सब कुछ.. लग रहा है किसी नई जगह आ गया हूं ! यहां पर तो सिनेमा हॉल होता था, यह मल्टीप्लेक्स कब बना ! और वहां... वहां हफ्ते में दो बार सब्जी मंडी लगती थी न... अब ये बीस मंजिला हाउसिंग सोसायटी... ! तो फिर सब्जी मंडी कहां लगती है... ? क्या ! वो लगती ही नहीं .. ! ओह... तो अब सब्जी की खरीदारी मेगास्टोर से हो जाती है... वाकई, बड़ी तरक्की कर गई यह जगह तो.. !!’ वगैरह, वगैरह...। कुल जमा बात यह कि वो परिचित जगह भी हमें नितांत अजनबी लगती है, मानो हमारे कदम वहां पहली बार पड़ रहे हों। यह तो तय है कि समय, हालात और जरूरत के मुताबिक परिवर्तन होने हैं, यह संसार का नियम है। लेकिन इन परिवर्तनों के साथ भी एक नियम जुड़ा है, और वो यह कि जो परिवर्त...

यात्राएं और प्रेम

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यात्रा एं हमारे जीवन को फिर से शक्ति एवं प्यार से सींच देती हैं। - रुमी , प्रख्यात फारसी कवि जब हम किसी यात्रा पर जाते हैं तो अपना घर बेशक कुछ समय के लिए छोड़ते हैं , पर मन के मैल को हमेशा के लिए कहीं दूर छोड़ आते हैं। हम स्वभाव से निर्मल होकर लौटते हैं ; जीवन के सटीक मायनों को समझकर लौटते हैं ; हम स्वयं से और पूरी कायनात से प्रेम करना सीखकर लौटते हैं। जाने-माने अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन ने जब यह लिखा कि- ‘ यात्रा करना पूर्वाग्रह , धर्मान्धता और संकीर्णता के लिए घातक है ’, तो उनका इशारा यही था कि यात् रा एं आपको भीतर से झाड़-पोंछकर ऐसा बना देती हैं कि आप प्रेम को अनुभव कर सकें , प्रेम को इसके वास्तविक मायनों में जी सकें। प्रेम करने का आधार ही यह है कि हम निश्छल हों ; जिससे प्रेम करें उस पर पूरा भरोसा हो ; और प्रेम की महक से तन-मन को सराबोर करने के लिए उन्मुक्त मन से उसका स्वागत करने को तैयार खड़े हों। मन में सवालों की घुंडियां होंगी , तो प्रेम कहां घर बना पाएगा ? किसी भी बात को लेकर असहनशील होंगे तो किसी को प्यार से कैसे गले लगा पाएंगे ? अपने को दूसरे से बेहतर ...

मालदीव- इस बार सुनामी सत्ता के समंदर में

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यह काहिरा का तहरीर चौक या बहरीन की राजधानी मनामा का पर्ल चौराहा नहीं था , और न ये दमश्क की गलियां थीं ;   न ही यहां पर उतनी तादाद में लोग जमा थे जितने एक साल पहले काहिरा , दमश्क या मनामा में अपने-अपने देश के शासक से मुक्ति पाने के लिए आंदोलन कर रहे थे। पर इनका मक़सद कमोबेश वैसा ही था। यह हिंद महासागर में कुल 1192 टापुओं से मिलकर बने देश मालदीव की राजधानी माले की गलियां थीं जिनमें 16 जनवरी से हर रोज़ हज़ारों लोग जुट रहे थे। ये लोग राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद की नीतियों के विरोध में उनसे इस्तीफ़े की मांग कर रहे थे। आंदोलन शुरू होने के 22 दिन बाद 6 फरवरी को आंदोलनकारियों की तादाद 12 हज़ार तक पहुंच चुकी थी। पुलिस विद्रोहियों के साथ थी। शाम होते-होते सेना भी आंदोलनकारियों के साथ आ खड़ी हुई।  माले के कोने-कोने में लोगों के रेले थे। सवा तीन लाख की आबादी वाले इस देश ने पहली बार अपने लोगों को इतनी बड़ी संख्या में एक साथ देखा था। इसके अगले दिन सुबह एक ख़बर हर चैनल पर थी- ‘ मालदीव में तख्तापलट! राष्ट्रपति नशीद ने पद छोड़ा। ’ कुछ देर बाद ख़बर आई- ‘ उपराष्ट्रपति मोहम्मद वहीद ...