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...जब मिटता चला गया डेढ़ सहस्राब्दी का अंतराल

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उस्ताद शुजात खान। इमदादखानी घराने के उस्ताद शुजात खान मशहूर सितारवादक उस्ताद विलायत खान के बेटे हैं। पूरा वातावरण अ ल ौ किक था। एक तरफ कोई पंद्रह सौ बरस पुरानी गुफाओं में बने हिंदू मंदिर तथा बौद्ध चैत्य जो कभी मंत्रोच्चार से गुंजायमान रहते होंगे... और एक तरफ संगीत की लहरों में प्रतिध्वनित होती शामें जिन्हें सुरों के अनूठे मिलन ने एक अभूतपूर्व दिव्यता प्रदान कर दी। आत्मा वही थी ; स्वरलहरियों के कोलाहल के बीच चित्त में जा घुलने वाली शांति भी संभवतया एक-सी थी ; एक लय में बहती ध्वनियों के माध्यम से मन तथा मस्तिष्क में गहरे उतर जाने वाली निस्तब्धता की अनुभूति वहां यकीनन पहले भी रही होगी ; नृत्यकला की विभिन्न भाव-भंगिमाओं के आलोक में कंदराओं के पत्थर पहले भी आह्लादित हुए बिना नहीं रहे होंगे। यदि कोई अंतर महसूस हो रहा था तो डेढ़ सहस्राब्दी के उस अंतराल मात्र का जो इन दो समयकालों को अलग कर रहा था।   बीते सप्ताहांत अरब सागर में मौजूद एलिफेंटा द्वीप पर संगीत व कला की अभिव्यक्तियां अपने चरम पर थीं। यहां हर साल होने वाले एलिफेंटा महोत्सव को इस बार बौद्ध एवं हिंदू स्थापत्यकला के उन बेज...

तस्वीरें जो बहुत कुछ बोलती हैं...

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धूप भी वही है , परछाइयां भी वही हैं - फिर वो लातिन अमेरिका हो या हिंदोस्तान। फ़र्क सिर्फ़ उस नज़र का है जो इसे देखती है और धूप - छांह के बीच बुने रंगों की एक तस्वीर के रूप में रचना कर डालती है। चंडीगढ़ में कोई विरला ही होगा जो ब्राज़ील की राजधानी की ख़ूबसूरती से रू - ब - रू हुआ होगा , लेकिन सवाल यह है कि अपने ही शहर को भी क्या यहां के बाशिंदों ने उस नज़र से कभी देखा होगा जिस नज़र से स्टीफन हरबर्ट देख आए हैं ?   फ्रांस के इस छायाकार की खींची तस्वीरों में चडीगढ़ का अलग ही चेहरा उभर आता है। वही सुखना झील , रॉक गार्डन का वही पुल जहां से आप फेज़ -1 से फेज़ -2 में जाते वक़्त दसों बार गुज़रे होंगे , वही ओपन हैंड , थोड़ी ही दूर पानी में हिलती - डुलती हाईकोर्ट की मटमैली इमारत , सेक्टर -22 का वही पार्क , और वही गांधी भवन जिस पर डाक टिकट तक छप चुका है ! ... लेकिन यहां कुछ तो अलहदा है , यकीनन कुछ जुदा - जुदा सा है। यही बात ब्राज़ीलिय...