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यूं होता है अक्सर...

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समंदर के किनारे रेत के घरौंदे पर लिखने ही लगता है कोई अपने प्रिय का नाम कि लहर आती है   और छोड़ जाती है   अपने आने का निशान आधी छुट्टी की घंटी बजते ही बगूले की तरह भागते हैं बच्चे कक्षा छोड़कर और गणित की उलझन का हल लिखने के लिए श्यामपट की ओर बढ़ते मा ’ स्साब हक्क-बक्क खड़े रह जाते हैं खड़िया हाथ में पकड़े हुए प्यार की तलाश में निकलने वालों के साथ भी ऐसा ही घटता है अमूमन प्रेम का सागरमाथा छूने को पल-पल बढ़ रहे होते हैं   लगन और उम्मीद के साथ कि निकल जाती है पैरों के नीचे से ज़मीन अचानक और भरभराकर रसातल की राह पकड़ लेता है विश्वास का हिमालय

ख़ामोशी के शब्द

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होंठ लरजते रहे तरसते रहे ज़रा-सी बात को शब्दों की शक्ल देने के लिए खिड़की तक आकर जैसे रुक जाए कोई बादल   आंखों से होती रहीं लफ्ज़ों की बारिशें भिगोती रहीं तुम्हारे मन की ज़मीन मेरे मन की ज़मीन तुम भी तृप्त मैं भी तृप्त समेटकर अपने भीतर जज़्बातों के दरिया को वो जो नहीं जानते ख़ामोशी की ज़बान देखते रहे वो बस होंठों का लरजना 

ज़िंदा कविता की तलाश

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  बहुत दिनों से नहीं पढ़ी   कविता जैसी कोई कविता वो कविता   जिसे पढ़कर लगे   मैं हो आया हूं   उन गली-कूचों में   जहां बसते हैं मिट्टी में सांस फूंकते लोग   जहां आज भी ठंडक देती है हवा   जहां नहीं भूले हैं लोग   मनुष्य होने का मतलब कविता जिसे पढ़ूं तो लगे कि छू आया हूं उन संवेदनाओं को जो अक्सर रह जाती हैं अछूती आडम्बर परोसने की होड़ में जो जुड़ी रहती हैं धरती से और आकाश से करती हैं बात हाथ बढ़ाकर सहारा देते समय नहीं देखतीं जो दिन और रात कविता जो रची न गई हो केवल रचे जाने के लिए जो न तोड़े दम कवि से आलोचक आलोचक से किताब तक के सफर में जो हो शाश्वत इस तरह कि युगों के सीमाएं भी भूल जाएं अपने अर्थ ऐसी कविता जो न हो आत्ममुग्धि के लिए बुना हुआ शब्दजाल उस कविता के शब्द अर्थ गढ़ते हों और उन अर्थों में जीवन के असल रंग झरते हों जिसके शब्द सपनीले न हों बेशक लेकिन सपनों की बात करते हों कविता जो पहुंचे उन तक जिनकी वो बात करती है ताकि लगे उन्हें भी कि उनके दुःख-दर्द का है साझीदार को...

लोकतंत्र

1) रगड़-रगड़ कर चमकाया जा रहा है सड़क को। कल शाम यह भीग गई थी उन लोगों के लहू से जो मूक रहकर कर रहे थे कोशिश अपनी आवाज़ सुनाने की और इसके बदले में जिन्होंने झेली थीं लाठियां। इस सड़क से रोज़ की तरह आज भी गुजरेंगी उन लोगों की गाड़ियां जिन्हें हमने खड़ा किया है अपनी आवाज़ बनाकर जो करते हैं फ़ैसला कि कब आवाज़ उठाना क्रांति माना जाए और मौन रहना अपराध। सड़क की लाली आज अख़बारों ने ले ली है सड़क निष्कलंक चमक रही है उधर , दीवार पर चस्पां एक पोस्टर बोल रहा है- मताधिकार का प्रयोग करके लोकतंत्र को मज़बूत बनाएं। 2) नज़रें मिलाने की हिम्मत नहीं थीं नजरें झुका लीं... तर्कों का जवाब नहीं था कोई चुप्पी ओढ़ ली... आवाज़ उठी तो ख़तरे की आहट सुनाई दी आवाज़ दबा दी...। 3) अत्याचार की कहानी कहती शहर की सड़कें लाल थीं सुबह छपकर जो हाथ में पहुंचा उस अख़बार की ख़बरें लाल थीं हर कोई रो रहा था देश की आंखें लाल थीं अहिंसा का पुजारी तस्वीर बनकर लोकतंत्र के मंदिर में हर दीवार पर टंगा है ...वो केवल तस्वीरों में मुस्कराता है

ज़िंदगी का गीत

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हाथ में झोला टांग ले भइया समय से फ़ुरसत मांग ले भइया चल, दुनिया देखन चलते हैं... अनजाने से रस्ते होंगे लेकिन हाल समझते होंगे तेरी उंगली थाम चलेंगे सुबह, दुपहरी, शाम चलेंगे नए-नए से रंग सफ़र के करके तेरे नाम चलेंगे आँखें थोड़ी चमकीली कर दिल में थोड़ी-सी हिम्मत भर आ जा निकलें उन राहों पर नए तज़ुर्बों वाले जिन पर लाखों रंग खिला करते हैं चल, दुनिया देखन चलते हैं... रंग, नज़ारे, लोग नए-से पुरबा, पानी, भोग नए-से हर सू नई रवायत होगी दोहे कहीं पे आयत होगी दिल की गांठें खुल जाएंगी फिर न कोई शिकायत होगी खुलकर जो परवाज़ भरेगा आँखों का जाला निकलेगा तू धरती का हो जाएगा   अम्बर तुझमें आन मिलेगा देह को अब ज़िंदा करते हैं चल, दुनिया देखन चलते हैं... तेरी दुनिया से भी आगे इक दुनिया है, गर तू जागे बैठे-ठाले बहुत जिया रे अब तो अपना छोड़ ठिया रे पोथी है यह जीवन सारा पन्ने इसके पढ़ ले सारे घर में जो दुबका है डर से वो जीवन जीने को तरसे लेकिन बोझ हटा के सर से बेमक़सद जो निकले घर से ठौर उसे ही सब मिलते...

तुम्हारे लिए - 3

1) परबत - सा अडिग होता हूँ मैं दुनिया के सामने मोम - सा गलने लगता हूँ तुम्हारे सामने पड़ते ही ... ये क्या से क्या होता जा रहा हूँ मैं तुमसे प्यार होने के बाद झूठ लगती हैं मुझे औरों की कही हर बात तुम्हारे झूठ को जानते हुए कि झूठ है ये सच मानने को जी करता है ... किस भूलभुलैयाँ में खोता जा रहा हूँ मैं तुमसे प्यार होने के बाद आँखों की खिड़कियों पर पलकों का परदा करते ही उभरने लगते हैं रंग - बिरंगे अक्स तुम्हारे वक़्त - बेवक़्त करता हूँ आँखें बंद और मौका निकाल लेता हूँ तुम्हें अपने सामने लाने का ... हज़ारों रंग के इन्द्रधनुष बोता जा रहा हूँ मैं तुमसे प्यार होने के बाद 2) तुम्हारी कही हर बात बात नहीं गीत थी देर तक गुनगुनाता रहा जिन्हें तुम्हारा लिखा हर शब्द शब्द नहीं रीत था जीने का सलीका मान चला जिन्हें लबों से फूटी हँसी झरने की कल - कल थी जैसे आँखें बंद करके सुनी जिसकी खनखनाहट तुम्हारा वो अचानक छू लेना पारसमणि था मानो पल - पल निखरता गया मैं तुम्हारा वो मुड़कर मुस्करा देना किसी तस्वीर से कम नहीं सहेज लिया जिसे यादों के पन्नों पर तुम्हारे होने का मतलब र...

तुम्हारे लिए - 2

1) मन की भी आँखें होती हैं देख लेती हैं दूर तक पहाड़ों को लाँघ कर कोहरे की चादर के उस पार समंदर भी नहीं रोक पाते मन की नज़र को तुमसे मिला पहली बार लगा , जानता हूँ तुम्हें सदियों से हज़ारों बार देखा तुम्हें झाँकता था जब अपने भीतर तुमसे होती थी मुलाक़ात मन की आँखों ने सहेज कर रखा था तुम्हें अपनी पलकों पर 2) बहुत भटक लिया बर्फ - सी उजली मगर ठंडी मुस्कराहटों के शहर में बहुत बार देखी चहचहाते चेहरों ने मेरी अनमनी - सी खिलखिलाहट और समझ लिया कि शायद बहुत खुश हूँ मैं भी उनकी तरह एक अरसा बीता किसी ने नहीं पढ़ा मेरे चेहरे को नहीं की कोशिश जानने की कि मेरी आँखें भी हँसती हैं कभी ? इस सारे फ़रेब से निकल कर किसी के सामने बेपरदा होना है मुझे अब जी भर के रोना है ... मुझे फिर से तुम्हारे क़रीब होना है 3) बार - बार कहने पर भी नहीं कहती थी तुम कि करती हूँ प्यार तुमसे जब करता था इसरार इस बात का तुम तकती थी अपलक और मुस्करा देती थी , बस ! उस दिन तुम्हारे बालों में फूल लगाते वक़्त काँटे से जब छिल गयी थी उंगली मेरी चाहा था मैंने कि तुम दुपट्टे का सिरा फाड़कर लपेट दो...

तुम्हारे लिए - 1

1) गुनगुनी धूप के जैसा था तुम्हारा आना ... चटकने लगीं मन के तन पर जमी बर्फ की परतें उम्मीदों ने फिर चाहा अँगड़ाई लेना और धूप के परों पर सवार होकर उड़ चली ज़िन्दगी बुझता हुआ इक दिया मानो सूरज होने चला 2) कभी तुमसे कहता था लम्बी उम्र जियोगी तुम बस , तुम्हारे ही बारे में सोच रहा था ऐसा तुम्हें अब नहीं कह पाता घड़ी भर के लिए भी दिमाग़ से ओझल जो नहीं होती तुम .. 3) भीगी आँखें लिए मुस्करा देना मुश्किल हो सकता है किसी के लिए भी ... मुझे लेकिन बहुत कोशिश नहीं करनी होती इसके लिए मैं बस सोच लेता हूँ तुम्हारे बारे में एक बार !!

नई ग़ज़ल

दिल में तेरा ही ग़म है   कितना अच्छा मौसम है   हंसना रोना जो भी है   दुनिया तुमसे हमदम है झूठ कहा कि तेरे हैं   ये कहना भी क्या कम है आंखों आगे मौत खड़ी   फिक्र तेरी ही हर दम है

दो नवगीत

ब्लॉग शुरू किया नहीं कि दोस्त लोग इस पर रचनाएं डालने के लिए कहने लगे। डायरी पर पड़ी धूल हटाकर पन्ने पलटे तो कुछ साल पहले लिखे नवगीत सामने आ गए। उनमें से दो नवगीत यहां लिख रहा हूं। दोनों रचनाएं 'भास्कर ' में अलग - अलग वक़्त पर छप चुकी हैं ... क्या करूं मैं बात आज फिर उतरी गगन से पूर्णिमा की रात। कुछ दबी - सी कामनाएं ले रहीं अंगड़ाइयां बज उठी हैं क्लांत मन में सैकड़ों शहनाइयां रही मन की अनकही पर झनझनाया गात। एक पल मैं सोचती हूं दूसरे पल मुस्कराऊं और जो मैं हंस पड़ूं तो देर तक हंसती ही जाऊं कोई न जाने हुआ क्या खा गए सब मात। चांदनी मेरी हंसी का राज़ मुझसे पूछती चुप रहूं तो यह सहेली बेवजह ही रूठती नयन सबकुछ कह चुके अब क्या करूं मैं बात। आज फिर उतरी गगन से पूर्णिमा की रात।। रो दिया है फूल उड़ चला दीवाना भंवरा रो दिया है फूल। सांझ के पहलू में आकर घुल रहा है दिन चल पड़े चरवाहे वापस रेवड़ो...