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झील पर तैरते गांव में कुछ घंटे

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दक्षिण-पूर्व एशिया के देश कंबोडिया में टोनले सैप नामक जिस झील के किनारे सीएम रीप शहर बसा है , वो दक्षिण-पूर्व एशिया की ताज़े पानी की सबसे बड़ी झील है। शहर से 12 किलोमीटर दूर मौजूद यह झील अपने तैरते गांवों की वजह से विदेशी सैलानियों के लिए एक बड़ा आकर्षण है। अंकोर वाट मंदिरों के देश कंबोडिया में कदम रखे मुझे दो दिन गए थे और इस दौरान मैं राजधानी नोम पेन के तकरीबन सभी ख़ास हिस्सों से जान-पहचान बना चुका था। अंकोर वाट के लिए मुझे सीएम रीप जाना था , जो नोम पेन के उत्तर-पश्चिम में छह घंटे की दूरी पर है। जिस कंबोडिया को मैंने तस्वीरों में देखा था उसकी थोड़ी-बहुत झलक तो नोम पेन के बाहरी हिस्सों में नज़र आई , लेकिन वो छवि पूरी तरह से साकार नहीं हुई जिसमें पानी से भरे धान के खेत थे , खेतों में तिनकों से बना चौड़ा टोप पहने मेहनत करते किसान थे और खंभों पर टिके लकड़ी के मकान थे जिनमें सीढ़ी के ज़रिये दाखिल होना पड़ता है।     तीसरे दिन सीएम रीप के लिए सुबह-सवेरे बस पकड़ी तो सोचा नहीं था कि वहां जाकर मैं हज़ार साल पुराने हिंदू मंदिरों के अलावा कुछ ऐसा भी देखूंगा जिसके बारे में किसी ट...

अंकोर काल के गलियारों से गुज़रते हुए

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उत्तर-पूर्वी कोने से खींची गई अंकोर वाट मंदिर की तस्वीर। इसी कोने में कभी राजमहल होता था यह बात मैं यकीन के साथ कह सकता हूं कि उस समय यदि कोई मेरे चेहरे को पढ़ता तो उसे वहां विस्मय , प्रसन्नता और संतुष्टि के मिल-जुले भाव नज़र आते। एक सवाल जो मेरे मन में बरसों से उमड़ रहा था और जिसका जवाब मुझे कहीं नहीं मिल पाया था , वो सवाल अचानक अपने मायने खो बैठा था। सब कुछ कांच की तरह साफ था और सच मेरे सामने मुंह बाये खड़ा था... वो सच यह कि उस धरती पर राम के आदर्शों ने ही नहीं , कभी कृष्ण की नीतियों ने भी पांव धरा था। अंतर बस इतना कि जहां राम आज भी वहां के जनमानस में नायक की पदवी पर विराजमान हैं और आस्था के आधार में समाहित हैं , वहीं कृष्ण की गाथाएं समय की गर्त में विलीन होती गई हैं और केवल मंदिरों में हुई नक्काशी में ही सांस लेती नज़र आती हैं। मंदिर के पश्चिमी गलियारे के दक्षिणी हिस्से में महाभारत का दृश्य उस वक़्त मैं खमेर लोगों की धरती कंबोडिया में था और 900 बरस की उम्र पार कर चुके अंकोर वाट मंदिर के बाहरी पश्चिमी गलियारे में खड़ा था। गलियारे के बीचो-बीच एक अलंकृत प्रवेश द्वार था जो...

पलटिए थाई विरासत के पन्नों को

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नदी किनारे बने हैं राजमहल और सूर्योदय मंदिर... मंदिर के दूसरे तल से उस पार राजमहल दिखता है बैंकॉक के चमचमाते मॉल्स में शॉपिंग करने और भीड़भाड़ वाली सड़कों पर थाई भोजन का स्वाद लेते हुए तफरीह करने के अलावा इस शहर का असल आकर्षण इसकी आलीशान विरासत है। इस विरासत को देखे-समझे बिना ही अगर कोई बैंकॉक को अलविदा कहकर जाता है तो समझिए वो बहुत कुछ छोड़कर जा रहा है। अपनी पहली थाईलैंड यात्रा के दौरान बैंकॉक में दो दिन गुजारने के बावजूद मैं इसकी विरासत से रू-ब-रू होने का मौका नहीं निकाल पाया था। एक कसक मन में बनी रही...और यह तब तक ख़त्म नहीं हुई जब तक अपनी अगली यात्रा में मैं इन जगहों पर हो नहीं आया। वट अरुण मंदिर, राजसी महल तथा एमरेल्ड बुद्ध मंदिर में विचरने और छोटे-से-छोटे विवरण की तस्वीर ज़हन पर उतारने के बाद एक सवाल मन में आया कि क्या अपनी पहली यात्रा में मैं सचमुच बैंकॉंक होकर गया था, या कि बस इस भुलावे में जी रहा था कि मैंने बैंकॉक देख रखा है। ...और तभी मुझे एक और भुलावे की याद आई- जो हमारी ट्रेवल एजेंसियां अपने ग्राहकों को टूर पैकेज की शक्ल में देती है ; जिसमें आधे दिन का बैंकॉक सिटी...

तफरीह बैंकॉक की सड़कों पर

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पात्तया के रंग में भीगने के बाद अब बारी बैंकॉक की भीड़भाड़ में खोने की थी। बैंकॉक- मुस्कराहटों की धरती का सबसे बड़ा शहर ; एक ऐसा शहर जिसकी सड़कें कभी भी जाम हो जाने के लिए जानी जाती हैं ; एक वो शहर जो किसी भी खाने-पीने के शौकीन इन्सान के लिए जन्नत से कम नहीं.....और अगर कोई भी नई चीज़ देखकर उसे ख़रीदने से ख़ुद को रोक नहीं पाते हैं और दाम कम करवाने के लिए बहस करने में आपको मज़ा आता है, तो बैंकॉक से इश्क़ होना लाज़िमी है। थाईलैंड के अन्य शहरों में बारगेन की गुंजाइश कम है। वहां आप दाम करने को बोलेंगे तो एक गरमाहट-भरी मुस्कराहट के साथ जवाब मिलेगा- ‘ सॉरी, अप टू यू...। ’ लेकिन बैंकॉक ऐसा शहर है जहां आपके पास चीज़ें सस्ती करवाने के ज़्यादा मौके हैं। बाकी, बैंकॉक के ज़्यादातर भीड़भाड़ वाली गलियों व सड़कों में एक अजीब-सी महक तारी रहती है। मशहूर थाई व्यंजनों की महक है यह। थाई खाने का स्वाद दुनिया मानती है। थाई लोग खाने-पीने के शौकीन भी बहुत हैं। प्रतुमनाम, प्रदीपत रोड तथा खाओ सान इलाके ऐसे हैं जहां हर तरह के व्यंजन हैं। अगर केवल 25 बाट यानी 40 रुपए में आपको वेज फ्राइड राइस और 30 बाट यान...

पात्तया-3 : कैबरे, थीम पार्क और एनिमल फार्म

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पात्तया को इसके बिंदास तौर-तरीकों ने बेशक दुनियाभर में एक ऐसे सागरतटीय इलाक़े के रूप में लोकप्रियता दिलाई है जो युवाओं के लिए किसी जन्नत से कम नहीं है , लेकिन यहां पर कितने ही ठिकाने ऐसे भी हैं जहां ख़ालिस मनोरंजन है और दिनभर की मस्ती है। अभी तक पात्तया की अपनी घुमक्कड़ी में हमने उन जगहों को छुआ जहां माहौल का अपना अंदाज़ है, और यह हम पर है कि उस माहौल में ख़ुद को हम कैसे ढालते हैं, उसे कैसे जीते हैं, कैसे महसूस करते हैं। आज पात्तया की अपनी तफ़रीह के इस अंतिम चरण में हम उन जगहों पर चलते हैं जहां पहुंचकर वहां के रंग में आपको रंगना ही पड़ेगा ; आपकी मर्ज़ी नहीं वहां चलने वाली। खो जाएं कैबरे की चकाचौंध में पात्तया में शाम का धुंधलका छाने के साथ ही दो नए रंग घुलने लगते हैं- एल्काज़र और टिफेनी। ये दोनों डेढ़-डेढ़ घंटे के कैबरे शो हैं जिनमें पुरुष से स्त्री बन चुके युवा हिस्सा लेते हैं। थाईलैंड में लिंग परिवर्तन कराने का चलन दुनिया के किसी भी अन्य देश से कहीं ज़्यादा है। शहर में घूमते-फिरते आपको कितनी ही ऐसी लड़कियां दिखेंगी जो कभी मर्द थीं। इन्हीं ‘ मर्दाना लड़कियों ’ के क...