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शुरू का खिंचाव अंत तक नहीं ले जा पाई ‘डी-डे’

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आपने ऐसी फ़िल्में ज़रूर देखी होंगी जो पहले ही दृश्य में दर्शक की जिज्ञासा को चरम पर पहुंचा देती हैं और फिर अचानक वापस वहीं ला छोड़ती हैं जहां से आप चले थे। इस श्रेणी में अब आप ‘ डी-डे ’ को भी शामिल कर सकते हैं। भारत से निकलकर कराची जा छुपे एक माफ़िया डॉन के ख़िलाफ़ भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी के अभियान को आधार बनाकर लिखी गई यह कहानी अप्रत्यक्ष रूप से दाऊद इब्राहिम की तरफ इशारा करती है, पर इस डॉन ‘ गोल्डमैन ’ का किरदार जिस ढंग से गढ़ा गया है उसमें वह माफ़िया कम, मसखरा ज्यादा लगता है। यह कथानक आशाजनक सुर पर शुरू ज़रूर होता है, लेकिन फिर उसके बाद यूं बिखरता है कि आपका सारा वक्त इसके टुकड़े संभालने की कोशिश में निकल जाता है।        निखिल अडवाणी ने अपनी इस फ़िल्म में जितनी कोशिश इसके दृश्यों को फ़िल्माने में की है, उतनी पटकथा के स्तर पर भी कर लेते तो कथानक का हर मोड़ पर गाढ़ा एवं गहरा होना संभव हो पाता। इससे होता यह कि दर्शक का ‘ टेंशन बिल्ड-अप ’ बढ़ता जोकि किसी भी क्राइम-कम-स्पाई थ्रिलर फ़िल्म के लिए जीवनरेखा से कम नहीं होता। फ़िल्म ही क्यों... माइकल कॉनेली,...

अपने भीतर की यात्रा है ‘शिप ऑफ थिसियस’

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शुरूआत इसके नाम से करते हैं। ‘ शिप ऑफ थीसियस ’ एक विरोधाभास है, जो लंबे समय से दर्शनशास्त्रियों के बीच बहस का विषय रहा है। बहस इस बात पर कि किसी चीज़ का एक हिस्सा बदल देने से वह चीज़ वास्तविक रह पाती है या नहीं। अपनी इस फ़िल्म में फ़िल्मकार आनंद गांधी इस विरोधाभास पर चलने वाली बहस से आगे बढ़ते हुए इसे नैतिकता के तकाज़े तक ले गए हैं। फ़िल्म के ज़रिये आनंद सवाल उठाते हैं कि अगर शरीर का कोई अंग बदल दिया जाए तो क्या हम पहले जैसा इन्सान रह जाते हैं? या इसे यूं कहें कि क्या हम अवास्तविक होने से बचे रह पाते हैं? फ़िल्म में यह सवाल परदे पर ही नहीं रहता, यह देखने वाले में गहरे उतरता जाता है। फ़िल्म आपके दिलो-दिमाग़ में रिसती जाती है और इस सवाल के लिए आप आनंद का शुक्रगुज़ार हुए बिना नहीं रह पाते।       फ़िल्म में तीन कहानियां हैं जिनके लिए यह विरोधाभास एक निराकार सूत्रधार की तरह है। अंत से कुछ समय पहले तक ये कहानियां एक दूसरे से अलग ज़रूर लगती हैं, लेकिन जिस तार्किक तरीके से सब बातों को दृश्यों एवं संवादों के माध्यम से सामने रखा जा रहा है उसे देखकर इतना अंदाज़ा तो...

फ़िल्म देखने के लिए चल ‘भाग दर्शक भाग’

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वह बचपन से भागता रहा था ; भागना उसकी नियति थी। कभी वह मर्ज़ी से भागा तो कभी मजबूरी में। बालहठ के वशीभूत गरम रेत पर दौड़ा, तो कभी अस्तित्व को बचाने के लिए हालात के बवंडर से निकल भागा। कभी बहन का सम्मान न बचा पाने पर भीतर उफनते गुस्से की रौ में भागा, तो कभी कानून के हाथ से बचने के लिए चलती ट्रेन की छत पर भागने से भी उसने गुरेज़ नहीं किया। ...और जब वह मुहब्बत को हासिल करने के लिए खेल के मैदान में भागा, तब दुनिया ने सांसें थामकर उसे देखना शुरू कर दिया।        असल ज़िंदगी में ‘ उड़न सिख ’ के नाम से मशहूर मिल्खा नामक यह शख़्स जब परदे पर दौड़ता है तो आप उसे देखते रहने के लिए लगातार रुके रहना चाहते हैं। वह भागता है तो समय रुक जाता है। परदे पर जीवंत हो रहे मिल्खा को आप यूं एकटक देखते जाते हैं कि वक़्त की पाबंदी बेमानी लगती है। वह इसलिए कि आंखों के सामने भागता मिल्खा एक धावक नहीं बल्कि एक मुकम्मल किरदार है जिसमें इन्सानी भावनाओं एवं संवेदनाओं के कितने ही रंगों को आप अपने भीतर बिखरते हुए महसूस कर पाते हैं।        अगर ‘ भाग मिल्ख...

मंद चाल से चलती एक क्लासिक फ़िल्म है ‘लुटेरा’

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‘ लुटेरा ’ के नाम पर मत जाइए... क्योंकि अगर आप इसके शाब्दिक अर्थ पर जाते हैं तो फिर सोच ही नहीं पाएंगे कि यह फ़िल्म परदे पर चलती एक चित्रमय कविता हो सकती है ; गंगाघाट पर गूंजते रवींद्र संगीत की मद्धम स्वरलहरियों का कोई प्रतिबिम्ब लग सकती है ; इसका हर दृश्य विविध रंगों से ओत-प्रोत एक बड़े कैनवस का आभास दे सकता है। देखने वाले को यह एक ऐसी रचना प्रतीत होती है जिसे शिल्पकार ने बेहद सब्र के साथ पूरा किया है। शिल्पकार को जल्दी नहीं है और उसकी यह सोच फ़िल्म पर भी तारी हो गई लगती है। फ़िल्म निर्माण से लिहाज देखें तो यह लगभग हर तरह से एक क्लासिक फिल्म है, जो सबसे बेखबर अपनी सहज चाल से बहती जाती है। अगर आपका सौंदर्यबोध जागृत है और मंद बयार में बहते रहने से आपको गुरेज़ नहीं है तो यह आपकी फ़िल्म है।        कहानी पचास के दशक की है और इसकी पृष्ठभूमि में उस समय के बंगाल की है जब देश में जमींदारी प्रथा लागू थी। यह बेहद मासूम प्रेमकथा है जिसमें मध्यांतर से ठीक पहले एक अप्रत्याशित मोड़ है, जो आपको अगला दृश्य मिस करने की अनुमति नहीं देता। अब तक धीमी चल रही फ़िल्म यकायक ...

मुस्कराते रहिए ‘घनचक्कर’ के चक्कर में फंसकर

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यथा नाम तथा गुण ! ‘ घनचक्कर ’ पर यह बात सटीक बैठती है। यह फिल्म दर्शक को अंतिम दृश्य तक बेतरह घनचक्कर बनाए रखती है और दर्शक मौके-दर-मौके मनोरंजन की पुड़िया गटकता जाता है। अगर आप सिनेमाहॉल में कदम यह सोच कर रख रहे हैं कि इमरान हाशमी अभिनीत पात्र ही घनचक्कर है तो ‘ भूल ’ जाइए। असल में इसके सारे ही किरदार घनचक्कर हैं और फिल्म खत्म होने पर आपको समझ आता है कि इन पात्रों के साथ आप भी पूरा वक्त घनचक्कर बने हुए थे। फिर आप क्या करते हैं ? मुस्कुराते हैं और अपने आस-पास देखते हैं। अरे ! ये सब भी तो मुस्कराए जा रहे हैं।       राजकुमार गुप्ता निर्देशित ‘ घनचक्कर ’ की कहानी इसकी आत्मा है तो अभिनय इसकी प्राणवायु। कहानी को इस तरह से बुना गया है कि दर्शक पूरा वक्त अंदाजा लगाता रह जाता है। ‘ नोटों से भरा बैग आखिर है कहां... ’ , इस सवाल पर अनुमान पल-पल बदलते हैं। अभी संजय आत्रे (इमरान हाशमी) झूठ बोलता लग रहा है तो अभी नीतू भाटिया ( विद्या बालन ) झूठी लगती है। नीतू तर्क रखती है तो संदेह का कुतुबनुमा फिर संजय की ओर मुड़ जाता है। इस बीच एक पारिवारिक मित्र और ए...

संवेदनशीलता से भरपूर है ‘अंकुर अरोड़ा मर्डर केस’

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किसी फ़िल्म के टाइटल में ‘ मर्डर ’ शब्द नज़र आते ही इसे आप केवल इसलिए देखने जाते हैं कि कहानी में सस्पेंस होगा और ढाई घंटे तक परदे पर एक क्राइम थ्रिलर देखने को मिलेगा, तो यकीनन ‘ अंकुर अरोड़ा मर्डर केस ’ आपकी फ़िल्म नहीं है। हां, अगर आप संजीदा दर्शक हैं ; एक अभिभावक हैं ; अपनी संतान को ज़रा-सी चोट लगते ही आपका दिल दहल जाता है ; जानते हैं कि क़त्ल की परिभाषा में सिर्फ वो अपराध नहीं आते जिनसे अखबार आए दिन रंगे रहते हैं ; और फ़िल्म में हर पल किसी-न-किसी पात्र को अपने भीतर महसूस करके थोड़ा हिल जाना चाहते हैं, तो फिर आप यह फिल्म देखने में देर नहीं करना चाहेंगे।       किस तरह डॉक्टरों की लापरवाही मामूली-से बीमार बच्चे की जान ले सकती है और कैसे यह लापरवाही एक क़त्ल के बराबर है, यही इस फ़िल्म का कहानी है। ...लेकिन कोई फ़िल्म केवल कहानी नहीं होती। मायने इस बात के रहते हैं कि इसकी बुनावट कैसी है, कथानक में नाटकीयता कितनी है, फ़िल्म की रफ़्तार क्या है और शुरू से अंत तक के सफ़र पर यह किस तरह के मोड़ तय करती है। अगर इन सब पहलुओं को ध्यान में रखकर बात करें तो सुहेल...

वाकई दमदार निकले हवा में उड़ते ‘फ़ुकरे’

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वक़्त की क़िल्लत हो मगर मंज़िल अभी दूर हो, तो ? यकीनन, या तो पैर एक्सीलेटर पर दबता जाएगा या फिर आप कोई शॉर्टकट तलाशेंगे...बगैर इस बात की परवाह किए कि दिक़्क़तें कितनी आने वाली हैं। ...और अगर इस एक वाक्य की बात को लेकर एक कहानी बुननी हो , तो ? तब तो तय है कि सोचना पड़ेगा। एक्सेल एंटरटेनमेंट की नई फ़िल्म ‘ फ़ुकरे ’ उसी सोच का नतीजा है, लेकिन यह ज़रूर है कि यह सोच रास्ते में बेशक थोड़े-बहुत हिचकोले खाती रही हो, मगर अपनी मंज़िल पर सही-सलामत जा पहुंचती है।       युवा निर्देशक मृगदीप सिंह लांबा की ‘ फ़ुकरे ’ शुरू से लेकर अंत तक मनोरंजन का गुलदस्ता पेश करती है और बीच-बीच में ठहाके लगाने को मजबूर करती जाती है। शुरुआत में लगता है कि परदे पर एक ठोस कहानी के बजाय हमारी-आपकी ज़िंदगी के छोटे-छोटे किस्सों का ताना-बाना भर पेश होने वाला है...पर जैसे ही अलग-अलग व्यक्तित्व वाले चार युवाओं का रास्ता एक-दूसरे को काटता निकलता है तो एक कहानी शुरू होती है जो कुछ हंसते-मुस्कराते लम्हों से गुज़रती हुई दर्शक को आगे लेती जाती है।       अगर किरदारों के ल...