शुरू का खिंचाव अंत तक नहीं ले जा पाई ‘डी-डे’
आपने ऐसी फ़िल्में ज़रूर देखी होंगी जो पहले ही दृश्य में दर्शक की जिज्ञासा को चरम पर पहुंचा देती हैं और फिर अचानक वापस वहीं ला छोड़ती हैं जहां से आप चले थे। इस श्रेणी में अब आप ‘ डी-डे ’ को भी शामिल कर सकते हैं। भारत से निकलकर कराची जा छुपे एक माफ़िया डॉन के ख़िलाफ़ भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी के अभियान को आधार बनाकर लिखी गई यह कहानी अप्रत्यक्ष रूप से दाऊद इब्राहिम की तरफ इशारा करती है, पर इस डॉन ‘ गोल्डमैन ’ का किरदार जिस ढंग से गढ़ा गया है उसमें वह माफ़िया कम, मसखरा ज्यादा लगता है। यह कथानक आशाजनक सुर पर शुरू ज़रूर होता है, लेकिन फिर उसके बाद यूं बिखरता है कि आपका सारा वक्त इसके टुकड़े संभालने की कोशिश में निकल जाता है। निखिल अडवाणी ने अपनी इस फ़िल्म में जितनी कोशिश इसके दृश्यों को फ़िल्माने में की है, उतनी पटकथा के स्तर पर भी कर लेते तो कथानक का हर मोड़ पर गाढ़ा एवं गहरा होना संभव हो पाता। इससे होता यह कि दर्शक का ‘ टेंशन बिल्ड-अप ’ बढ़ता जोकि किसी भी क्राइम-कम-स्पाई थ्रिलर फ़िल्म के लिए जीवनरेखा से कम नहीं होता। फ़िल्म ही क्यों... माइकल कॉनेली,...