...जब मिटता चला गया डेढ़ सहस्राब्दी का अंतराल

उस्ताद शुजात खान। इमदादखानी घराने के उस्ताद शुजात खान मशहूर सितारवादक उस्ताद विलायत खान के बेटे हैं।
पूरा वातावरण किक था। एक तरफ कोई पंद्रह सौ बरस पुरानी गुफाओं में बने हिंदू मंदिर तथा बौद्ध चैत्य जो कभी मंत्रोच्चार से गुंजायमान रहते होंगे... और एक तरफ संगीत की लहरों में प्रतिध्वनित होती शामें जिन्हें सुरों के अनूठे मिलन ने एक अभूतपूर्व दिव्यता प्रदान कर दी। आत्मा वही थी; स्वरलहरियों के कोलाहल के बीच चित्त में जा घुलने वाली शांति भी संभवतया एक-सी थी; एक लय में बहती ध्वनियों के माध्यम से मन तथा मस्तिष्क में गहरे उतर जाने वाली निस्तब्धता की अनुभूति वहां यकीनन पहले भी रही होगी; नृत्यकला की विभिन्न भाव-भंगिमाओं के आलोक में कंदराओं के पत्थर पहले भी आह्लादित हुए बिना नहीं रहे होंगे। यदि कोई अंतर महसूस हो रहा था तो डेढ़ सहस्राब्दी के उस अंतराल मात्र का जो इन दो समयकालों को अलग कर रहा था। 
बीते सप्ताहांत अरब सागर में मौजूद एलिफेंटा द्वीप पर संगीत व कला की अभिव्यक्तियां अपने चरम पर थीं। यहां हर साल होने वाले एलिफेंटा महोत्सव को इस बार बौद्ध एवं हिंदू स्थापत्यकला के उन बेजोड़ नमूनों की निगाहों के समक्ष आयोजित किया गया था जो सदियों से अपनी भव्यता के मद में शान से खड़े हैं। महोत्सव में शामिल होने आए दिग्गज कलाकारों को भी निश्चित ही यह अहसास रहा होगा कि वो जहां आए हैं वहां उनका कला-प्रदर्शन एक ध्यानयोग के अतिरिक्त कुछ हो ही नहीं सकता। तभी तो उन्होंने सुर-लय-ताल के माध्यम से श्रोताओं को जिस सम्मोहन में जकड़ा, उससे निकलने में शायद उन्हें लंबा वक्त लगेगा।
शास्त्रीय गायन में मग्न श्वेता पंडित। हारमोनियम पर संगत कर रहे हैं उनके पिता एवं संगीतकार पंडित विश्वराज।
महोत्सव की शुरुआत का जिम्मा संगीतकारों के उस परिवार की नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती श्वेता पंडित पर था, जिसने पंडित जसराज जैसे लोग संगीत-जगत को दिए हैं। श्वेता ने सधे सुरों में मां काली की राग-आधारित वंदना से समारोह को सटीक आरंभ दिया, तो इसके बाद राग बागेश्री में पिरोकर प्रियतम को लौट आने का उनका आह्वान सुरों के परों पर सवार होकर कहीं दूर जाता महसूस हुआ। श्वेता ने अपने स्वरों को जहां विराम दिया, वहां से संगीत-जगत के दिग्गजों ने ऐसा सिरा पकड़ा कि सांझ का धुंधलका रात के आगोश में जाना मानो भूल ही गया। सितार पर उस्ताद शुजात खान की अंगुलियां का जादू चला, तो मन का हर कोना रोशनी से भर उठा। लेकिन यहां कमाल सितार की ध्वनियों का ही नहीं था। भारतीय एवं जैज संगीत के फ्यूजन के लिए दुनियाभर में मशहूर अमेरिकी संगीतज्ञ जॉर्ज ब्रूक्स जिस खूबसूरती से सितार की धुन में सैक्सोफोन के सुर मिला रहे थे, वो जल-थल की सीमाएं पार करता लगा। इस जुगलबंदी में कार्नाटिक संगीत के बड़े नामों में शामिल वायलिन-वादक कुमरेश व गणेश और खंजीरा-वादक पी. सेल्वगणेश भी मोती पिरोते रहे। हिंदोस्तानी, कार्नाटिक व जैज संगीत का अनमोल मिश्रण थी यह पेशकश।
नृत्यांगपार्वती दत्ता की अगुवाई में 'सन्निधि' के कलाकारों ने एक साथ सात शास्त्रीय नृत्यों का संगम पेश किया।
समारोह के पहले दिन का समापन हुआ सन्निधि से जिसमें देश के सात शास्त्रीय नृत्यों का संगम था। पं. केलुचरण महापात्र तथा प. बिरजू महाराज की शिष्या पार्वती दत्ता के अगुवाई में सात नृतकों के थिरकते पांवों तथा सुरुचिपूर्ण भाव-भंगिमाओं ने मंच को मानो नई प्राण-ऊर्जा से भर दिया। हालांकि, समय कम मिल पाने की वजह से अपनी कला को कांट-छांट कर पेश करने की पीड़ा सन्निधि के कलाकारों के चेहरे पर साफ झलक रही थी।
रंजीत बारोत और उनके साथियों ने पूरे माहौल को चमत्कृत कर दिया। रंजीत मशहूर नृत्यांगना सितारा देवी के बेटे हैं।
मखमली आवाज़ के मालिक डॉ. प्रभाकर कारेकर अपने शास्त्रीय गायन से मन के सितार को झंकृत करते चले गए।
रविवार शाम को महोत्सव के दूसरे दिन का आगाज प्रख्यात शास्त्रीय गायक डॉ. प्रभाकर कारेकर के सुरों से हुआ। लाल रंग होरी खेलूं...गीत से उनकी मखमली वाणी जहां गुलाल की तरह उड़कर मानस-पटल को रंगती चली गई, वहीं सांवरे, आये जइयो जमुना किनारे सुनकर लगा कि अगर कान्हा कहीं आस-पास होते तो राधा की इतनी करुण पुकार सुनकर अवश्य दौड़े चले आते। शुद्ध भारतीय शास्त्रीय संगीत की इस रस-मंजूषा के बाद बारी फिर से फ्यूजन की थी। मशहूर कथक नृत्यागंना सितारा देवी के बेटे तथा अंतरराष्ट्रीय पटल पर फ्यूजन म्यूजिक के ध्वजावाहकों में एक रंजीत बारोत और उनके साथियों ने शाम को अलग ही रोमांच से भर दिया। वीणा पर पुण्या श्रीनिवास, बांसुरी पर अश्विन श्रीनिवास तथा गिटार पर आदित्य बेनिया की जुगलबंदी ने ढोल पर रंजीत बारोत की थिरकती अंगुलियों से निकली ताल के साथ मिलकर जो जादू फेरा, उससे एलिफेंटा की कंदराओं में उकेरी तांडव करते शिव की पाषाण प्रतिमाएं निश्चित ही प्राणवान होकर थिरक उठी होंगी। 
उत्सव का समापन हुआ नृत्य की पेशकश से। कथक में सूफी संगीत के मिश्रण का अनूठा प्रयोग करने वाली जानी-पहचानी नृत्यांगना मंजरी चतुर्वेदी के नृत्य-कौशल से वातावरण अभिभूत हो उठा। कथक नर्तक पंडित अर्जुन मिश्रा की शिष्या तथा लखनऊ घराने की मंजरी ऐसी अकेली कलाकार हैं जिन्होंने सूफीवाद की रहस्यात्मकता को नृत्य की विधा में पिरोया है। सूफी गायन की स्वरों में लिपटे उनके मंत्रमुग्ध कर देने वाले नृत्य के अतिरिक्त शायद ही कोई अन्य पेशकश इस महोत्सव के समापन के लिए उपयुक्त होती जोकि उस जगह हो रहा था जो कभी दो धर्मों के आध्यात्मिक उद्यम का साक्षी रहा है।

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2 comments:

darshi dabar said...

अलौकिक महोत्सव की अद्भुत प्रस्तुति...!!

MANU PRAKASH TYAGI said...

बढिया रहा