Friday, April 3, 2015

हमारे दिमाग के पेंच कौन सुलझाएगा???

अभी कुछ देर पहले दिबाकर बनर्जी की फिल्म डिटेक्टिव ब्योमकेश बक्शी देखकर लौटा हूं और लगातार दिमाग की उलझनें सुलझाने में व्यस्त हूं। ये उलझनें तभी बनना शुरू हो गई थीं जब मैं सिनेमाहॉल में बैठा फिल्म देख रहा था। दिबाकर का ये जासूस किरदार बेशक अपने दिमाग की ग्रे सेल्स का इस्तेमाल करते हुए दो-जमा-दो-चार करके चुटकियों में किसी भी मामले की परतें खोल देता हो, मगर दिबाकर अपनी फिल्म में दिखाना क्या चाह रहे हैं, इस राज की परतें खोलने में तो मेरे दिमाग की चूलें तक हिली जा रही हैं। न भई न, मैं ब्योमकेश बक्शी नहीं हूं। ...और न ही मैं वैसा ब्योमकेश होना ही चाहता हूं जिसे दिबाकर सिनेमा के परदे पर लेकर आए हैं।
फिल्म बांग्ला लेखक शरदेंदु बनर्जी के लोकप्रिय जासूस पात्र ब्योमकेश बक्शी पर आधारित है। ब्योमकेश को लेकर भारत में फिल्में बनती रही हैं। दिबाकर की फिल्म शरदेंदु बनर्जी की पहली कहानी सत्यान्वेषीपर आधारित है जिसे उन्होंने साल 1932 में लिखा था। हालांकि, कोलकाता के एक हॉस्टल में घटित होती इस कहानी और इसमें अंजाम दी गई हत्याओं को डिटेक्टिव ब्योमकेश बक्शी में दस साल आगे ले जाते हुए दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान कोलकाता पर संभावित जापानी हवाई हमले तथा अंतरराष्ट्रीय ड्रग माफिया का मुलम्मा चढ़ाकर पेश किया गया है। दिबाकर ने एक सीधी-साधारण कहानी को इस कदर पेंच दे दिए हैं कि ये आखिरकार देखने वाले के दिमाग की नसों को जख्म देने के सिवा कुछ और नहीं करते।
चलिए, डिटेक्टिव ब्योमकेश बक्शी को एक आसान से सवाल की कसौटी पर कसते हैं। आखिर ब्योमकेश का किरदार इतना लोकप्रिय क्यों हो पाया? जवाब यह कि वो किरदार उन कहानियों का हिस्सा रहा जिनमें रहस्य-रोमांच तो था लेकिन जिनकी बुनावट बेहद सरल थी; जिन कहानियों के सब किरदारों –नकारात्मक या सकारात्मक- के व्यवहार के पीछे मूल इन्सानी प्रवृत्तियां असल वजह होती थीं। लेकिन दिबाकर की फिल्म के तकरीबन सभी किरदारों (अंगूरी को छोड़कर) को इन्सानी तबीयत नहीं बल्कि हालात हांकते दिखते हैं। पूरी फिल्म के दौरान आप किसी किरदार जुड़ ही नहीं पाते। यूं कहें कि वे किरदार आपको असल ही नहीं लगते। तिस पर, एक वैज्ञानिक की हत्या की छानबीन के बीच चीनी ड्रग माफिया, कोलकाता पर कब्जे करने के जापानी मन्सूबे, वहां रहते दूसरे देश के भेदिये, कोलकाता-का-किंग-कौन जैसी चाहत में भेस बदलकर रहता एक विदेशी हत्यारा, स्वतंत्रता संग्राम की लपटें, इन लपटों में कूदने को तैयार युवा... इन सबको मिलाकर डिटेक्टिव ब्योमकेश बक्शीके नाम पर जो घालमेल परोस दिया गया है वह किसी होटल में अनाड़ी शेफ के हाथों बनी मिक्स्ड वेजिटेबल से ज्यादा कुछ नहीं लगता है। फिल्म देखते वक्त आप इस सच से भागना चाहते हैं कि यह फिल्म उसी फिल्मकार की है जिसने खोसला का घोंसला से शुरुआत करते हुए लगातार अच्छी फिल्में भारतीय सिनेमा को दी हैं।
यह भी है कि अगर आप एकबारगी फिल्म के उलझाव एवं ऊब भरे कथानक को एक तरफ रख दें, तो इस बात की तारीफ किए बिना नहीं रह पाएंगे कि परदे पर दिबाकर 70 साल पहले के दौर को रचने में बखूबी कामयाब रहे हैं। किरदारों के पहनावे, लोकेशन्स तथा कलर-इफेक्ट के जरिये उन्होंने उस दौर को शानदार ढंग से चित्रित किया है जिसमें वे कहानी कह रहे हैं। कलाकारों के चयन से लेकर अदाकारी तक फिल्म इक्कीस नजर आएगी। डॉ. गुहा के किरदार में नीरज कबि उल्लेखनीय हैं, जिनकी ‘शिप ऑफ थीसियस के बाद दूसरी दमदार पेशकश देखने को मिली है। सुशांत (ब्योमकेश), आनंद तिवारी (अजित बनर्जी) तथा स्वास्तिका मुखर्जी (अंगूरी) भी आपकी दाद ले जाएंगे। बस, अगर इतना होता कि दिबाकर इसकी कहानी को सहज-सरल रखते और यह सोचते कि सारे मसाले एक ही फिल्म में क्यूं डालूं, आगे और भी तो फिल्में बनानी हैं,’ तो यह फिल्म यकीनन कुछ और हो सकती थी।

Friday, March 20, 2015

इस शिकारी के सब तीर निशाने पर

ज़िंदगी में हम कितना भी भटक लें, शारीरिक ज़रूरतें पूरी करने के पीछे कितना भी लगे रहें, लेकिन आख़िरकार हमारे लिए जो सवाल मायने रखेगा, वो यह कि क्या कोई ऐसा इन्सान है हमारी ज़िंदगी में जो हमसे वाकई प्यार करता है... एक ऐसा साथी जिस पर हम इतना भरोसा कर सकें कि हमें कभी झूठ का लबादा ओढ़कर न जीना पड़े?”
इस गंभीर-सी लगने वाली बात को संदेश के तौर पर लेकर चली फ़िल्म हंटर सेक्स संबंध बनाने को बेसब्र रहने वाले युवा मंदार की ज़िंदगी के जरिये एक चुलबुली पेशकश के तौर पर सामने आती है। इतनी चुलबुली कि हंटर अपने पूरी अवधि के दौरान हल्के-फुल्के मनोरंजन का अच्छा ज़रिया साबित होती है। इसकी ख़ूबसूरती यह है कि इसका विषय सेक्स पर केंद्रित होने के बावजूद यह सेक्स मसाले से भरपूर फ़िल्म नहीं है, बल्कि सेक्स के आदी हो चुके एक युवा की क़शमक़श को परदे पर लाती है।
फ़िल्म का कथानक मंदार (गुलशन देवैया) नामक इंजीनियर के आस-पास घूमता है, जो यौन संबंधों को लेकर अपने आजाद ख़यालात की वजह से दोस्तों के बीच बेहद चर्चित है। फिल्म में बार-बार फ्लैशबैक में जाकर मंदार की ज़िंदगी की परतों में झांका जाता है जहां हमें एक युवक के सेक्स का आदी होते जाने तथा उसके सेक्सुअल एन्काउंटर्स की झलकियां मिलती है। वहीं वर्तमान में उम्र बढ़ने के साथ मंदार का धीरे-धीरे सेक्स से मोहभंग होने का चित्रण है। इसकी एक बड़ी वजह उसका तृप्ति (राधिका आप्टे) से उसका जज़्बाती तौर पर जुड़ते जाना है, जिससे वह शादी करके आखिरकार सेटल हो जाना चाहता है।
मंदार की ज़िंदगी का उलझा हुआ ताना-बानाहंटर की पटकथा का आधार है, जिसे लेखक ने सुलझे हुए तरीके से पिरोया है। फ़िल्म की एक बड़ी ख़ासियत यह है कि एक बिंदास लेकिन गंभीर विषय पर होने के बावजूद इसकी पेशकश हास्य से भरपूर है जो न तो हमें कहीं उबासी लेने देती है और न ही हमारे सामने नैतिकता के सवाल आते हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह इसके चुटीले संवाद हैं, जो हमें हंसाते रहते हैं। नहीं, नहीं! यह ग्रैंड मस्तीटाइप की सेक्स कॉमेडी नहीं है; इसमें डबल-मीनिंग फूहड़ संवाद नहीं ठूंसे गए हैं। हंटर के संवाद स्वाभाविक हैं और सिचुएशनल भी, जिन्हें हम अपने आस-पास बोलते-सुनते रहे हैं। वो हमें अजीब नहीं लगते, बल्कि अप्रत्याशित होने की वजह से वे गुदगुदा ज़रूर जाते हैं।
रिलीज़ से पहले हंटर को सॉफ्ट पॉर्न श्रेणी की फ़िल्म बताया जा रहा था, लेकिन अपनी सवंदेनशील प्रस्तुति की वजह से यह एक अच्छी फ़िल्म के तौर पर सामने आती है। जहां तक इसके सेक्स कंटेंट का सवाल है तो वह लगभग हर बार सांकेतिक ही है। इसका एकमात्र बोल्ड दृश्य तब है जब मंदार अपनी पड़ोसन ज्योत्स्ना (साई तम्हाणकर) के साथ संबंध बनाता है। लेकिन वह दृश्य इतना स्वाभाविक बन पाया है कि कोई सवाल खड़े नहीं करता। फ़िल्म देखकर साफ हो जाता है कि इसके निर्देशक हर्षवर्द्धन कुलकर्णी अपनी सीमाएं न केवल जानते हैं बल्कि उन्हें निभाने का हुनर भी उनके पास है। हां, अपने आखिर में फ़िल्म को लंबा खिंचने से वे नहीं बचा पाए हैं, ख़ास तौर पर तब जब तृप्ति को सबकुछ बताकर लौट रहा मंदार दो बार काल्पनिक स्थितियां अपने चचेरे भाई दिलीप को बताता है। एक बार बताना मज़ेदार लगता है, उसे दोहराना चिड़चिड़ाहट पैदा करता है।
फ़िल्म में कलाकारों का चयन उम्दा है और लगभग सब कलाकार अपने किरदार में हैं। गुलशन अपने चरित्र की विभिन्न अवस्थाओं को बखूबी जी पाए हैं और गोलियों की रासलीला- रामलीला के बाद यह उनकी अदाकारी की लगातार दूसरी दमदार पेशकश है। साई तथा राधिका ने अपने-अपने चरित्र से पूरा न्याय किया है, वहीं दिलीप के किरदार में सागर देशमुख असरदार हैं। पारुल की भूमिका में वीरा सक्सेना भी अपनी मौजूदगी दर्ज़ कराती हैं। लब्बो-लुआब यह कि हंटर एक वयस्क किंतु मनोरंजक फ़िल्म है, जिसका हम अपने हमउम्र लोगों के साथ यक़ीनन मज़ा ले सकते हैं।

पहले ही स्टेशन पर अटकी धीमी गति की लोकल

वरुण धवन की मुख्य भूमिका वाली नई फिल्म बदलापुर की टैगलाइन है- डोन्ट मिस द बिगनिंग। यानी, इसकी शुरुआत देखने से मत चूक जाइएगा। फिल्म देखने के बाद इस टैगलाइन का मकसद शीशे की तरह साफ हो जाता है, क्योंकि शुरुआती दृश्यों के बाद फिल्म में कुछ भी तर्कसंगत नहीं है। फिल्म धीमी है, चलती है चल-चलकर अटकती है और देखने के वाले के जहन में बार-बार खटकती है। एक बैंक डकैती में पत्नी व बेटे को खोने के बाद राघव (वरुण धवन) के किरदार का खाका क्या है, उसकी मानसिकता में क्या बदलाव आया है और वो आखिर चाहता क्या है, यही सोचने-समझने की कोशिश में आपका सारा वक्त निकल जाता है। ...और तिस पर खराब बात यह कि आपकी यह कोशिश सिरे से बेकार चली जाती है। आखिर में आप खुद को यह सांत्वना देते सिनेमाघर से बाहर निकलते हैं कि फिल्म बेशक बोझिलता से भरपूर निकली, लेकिन लायक की भूमिका में नवाजुद्दीन सिद्दीकी के शानदार अभिनय के अलावा कुमुद मिश्रा को इंस्पेक्टर गोविंद और प्रतिमा काजमी को लायक की अम्मी का किरदार जीते हुए तो कम-से-कम देख पाए। और हां, बीच-बीच में चुटीले संवाद भी थोड़ी राहत दे जाते हैं।
फिल्म के मुख्य किरदार के चरित्र चित्रण में सतहीपन इस कदर है कि लगता है या तो फिल्म को बहुत तेजी में बनाया गया है या फिर इसे लिखने बैठे लोगों की सोच गहरी नहीं थी। जरा इन उदाहरणों पर गौर करें। राघव बैंक डैकती की घटना के जिम्मेदार लायक के रिहा होने तक और उसकी पत्नी पर गोली लायक ने चलाई थी या कि उसके पार्टनर हरमन (विनय पाठक) ने, यह पुख्ता तौर पर जानने के लिए 20 बरस इंतजार करने को तैयार है, मगर बिना तह तक पहुंचे आनन-फानन में हरमन और उसकी पत्नी कोको (राधिका आप्टे) की बेरहमी से हत्या करने से खुद को रोक नहीं पाता। फिर जब उसे लायक खुद बताता है कि असली कातिल वो है, तो उसे राघव जाने देता है। अजीब बात है! दूसरे, हरमन के साथ-साथ वह कोको को भी मार देता है, जबकि कोको तो एक रात पहले तक पति की असलियत भी नहीं जानती थी। अगर कोको की जान लेनी ही थी तो क्या थोड़ा-बहुत तर्कसंगत यह नहीं होता कि वो हरमन को जिंदा छोड़ देता, यह सोचकर कि जो पीड़ा उसने झेली है वैसी पीड़ा उसके परिजनों का हत्यारा भी झेले। उसकी पत्नी के साथ हमबिस्तर होने का स्वांग रचकर भी तो वह उसे पीड़ा ही पहुंचा रहा है, वरना वो स्वांग रचने की जरूरत ही क्या थी। खैर, कोको को मारने के पीछे राघव के पास जो भी वजह रही हो, लेकिन क्या उसी वजह के चलते उसे लायक की मां की हत्या भी नहीं कर देनी चाहिए थी?
बदलापुर बेहद धीमी गति से चलती है। दृश्य लंबे हैं और बहुत जगह बेवजह खींचे गए हैं। धीमी गति की मुंबई लोकल की तरह फिल्म जगह-जगह रुकती है, पर अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंचती। फिल्म अपने अंत में अगर यह संदेश (अगर कोई संदेश देने का फिल्मकार का मकसद था, तो) देती दिखती है कि बदले की भावना को पालते-पोसते रहने का कोई औचित्य नहीं है, तो भी फिल्म का जो ताना-बाना है वो अपने पूरे सफर केदौरान मकसद तक पहुंचता नहीं दिखता है। बदलापुर एक अधपकी फिल्म के तौर पर सामने आती है, मगर इसका संगीत कुछ हद तक प्रशंसा के लायक जरूर है। हालांकि, गीत जी करदा... का अति-प्रयोग खटकता है। अपनों को खोकर बिखर चुके एक इन्सान के तौर पर वरुण की लुक तो असरदार है, लेकिन अपनी अदाकारी एवं संवाद अदायगी से वो उस इन्सान को परदे पर पेश नहीं कर सके हैं। उनकी आवाज मर्म के स्पर्श को तरसती रही है और जज्बात उनके चेहरे पर आने से इनकार करते रहे हैं। दिव्या दत्ता, अश्विनी कलसेकर तथा मुरली शर्मा जैसे मंझे कलाकारों के लिए करने को ज्यादा कुछ नहीं था, वहीं हुमा कुरैशी तथा यामी गौतम निराश करती हैं। राधिका आप्टे काफी हद तक किरदार में हैं, पर यह समझ से परे है कि एक नहीं-के-बराबर भूमिका के लिए उन्होंने परदे पर कपड़े त्यागने के लिए हां क्या सोचकर कर दी।