Saturday, September 14, 2013

भागते-भागते दूसरे हाफ़ में हांफ गई ‘जॉन डे’

ज्ञानी लोग कहते हैं कि जब मौत सिर मंडरा रही हो तब इन्सान को ज़िंदगी के असल मायने समझ आते हैं, कितनी ही चीज़ें उसे बेमानी लगने लगती हैं और जीवन भर किए अपने ग़लत कामों पर उसे पछतावा महसूस होता है। इन्सान भ्रम के कितने भी चश्मे लगाए चलता रहे, मरते वक़्त उसके सामने सारी तस्वीर साफ़ हो जाती है। मौत से पहले के कुछ ऐसे ही पल उसे मुक्ति दिला जाते हैं।
      अहिशोर सोलोमन की निर्देशक के रूप में पहली फ़िल्म जॉन डे का कथानक आम कहानियों जैसा नहीं है कि जिसका कोई तार्किक अंत होता हो। यह फ़िल्म एक स्टोरीलाइन की घटनाओं का चित्रण भर है, लेकिन एक अनकहे सवाल के साथ ज़रूर ख़त्म होती है कि हम जिस सत्य को मरते समय समझकर मुक्ति का अहसास पा जाते हैं (जैसा कि फ़िल्म का एक किरदार ख़ान साहब कहता भी है), उस मोक्ष की स्थिति को हम जीते-जी महसूस क्यों नहीं कर सकते? अंतर केवल अपने अदंर के जानवर को ख़त्म करके एक इन्सान होकर सोचने का ही तो है।
      फ़िल्म जॉन डे इसी नाम के एक ऐसे आम इन्सान (नसीरुद्दीन शाह) के बदले की कहानी है जिसे पता चलता है कि उसकी बेटी की मौत हादसा नहीं थी, बल्कि चंद लोगों के लालच का नतीज़ा थी। बदले की इस राह में उसका टकराव एक भ्रष्ट पुलिस अफ़सर गौतम (रणदीप हुडा) से होता है जो बचपन में ही अनाथ होने के बाद एक ऐसे व्यक्ति का शिकार होता है जिस पर वह भरोसा करता है। बड़ा होने के दौरान वह ख़ुद को जानवर बनाता जाता है, लेकिन अपने अंदर के इन्सान को मारने में सफल नहीं हो पाता। फ़िल्म में यह स्थिति गौतम की ही नहीं, हर उस इन्सान की है जो ग़लत रास्ता अख़्तियार किए हुए है।
      कहानी के अलग-अलग मोड़ों पर लालच, लालसा एवं धोखे का चित्रण है। पहले हाफ़ में फ़िल्म ने अपनी रफ़्तार बनाए रखी है, लेकिन दूसरे हाफ़ में आकर यह हांफने लगती है। अहिशोर ने अपनी इस फ़िल्म में बहुत ज़्यादा ख़ून-ख़राबा दिखाया है, कई जगह वीभत्स दृश्यों को रखा है। ताज्जुब होता है कि अच्छी फ़िल्म बनाने की राह पर चलते-चलते कोई फ़िल्मकार कैसे अचानक लड़खड़ा सकता है, कैसे वो ऐसी ग़लतियां कर जाता है! क्या वह फ़िल्म को एक दर्शक होकर नहीं देख पाता? जिन लोगों को परदे पर थोड़े-थोड़े वक़्त बाद ख़ून बिखरते देख उबकाई आती हो, उनके लिए इस फ़िल्म से दूर रहना ही बेहतर होगा।
      इस फ़िल्म को आप इसके अंतर्निहित संदेश के अलावा नसीरुद्दीन शाह तथा रणदीप के लिए देख सकते हैं। नसीर अगर कमाल हैं, तो वहीं उनके शिष्य रणदीप ने अपने गुरु का मुक़ाबला करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। बॉम्बे टॉकीज़ के बाद रणदीप की यह लगातार दूसरी बेहतरीन परफॉरमेंस हैं। साथ ही यह भी कि लगातार दूसरी फ़िल्म में उनका पुरुष के साथ होंठ-से-होंठ मिलाने का दृश्य है (हालांकि इस बार मंतव्य अलग है)। इलीना कज़ान के पास शराब पीने के अलावा कुछ करने को नहीं था और जो करने को दिया भी गया उसमें भी वह असफल रही हैं। विपिन शर्मा तथा शरत सक्सेना अपनी-अपनी भूमिकाओं में बढ़िया नज़र आए हैं। फ़िल्माकंन के दृष्टि से यह फ़िल्म औसत ही कही जाएगी। कुल मिलाकर यही कि अगर अहिशोर वीभत्सता दिखाने से बच जाते तो फ़िल्म का स्तर थोड़ा ऊंचा हो जाता।

दोस्तों के साथ ही कर पाएंगे ‘ग्रैंड मस्ती’

यह फ़िल्म देखने का मन बनाने से पहले कृपया ये तीन चेतावनियां ज़रूर पढ़ लें...
  • यह परिवार के साथ देखे जाने वाली फ़िल्म कतई नहीं है। ऐसा न हो कि आप इस चेतावनी को नज़रअंदाज़ करते हुए परिवार को अपने साथ सिनेमा हॉल में ले जाएं और फिर पहले दो-चार मिनट में ही अपने अगल-बगल बैठे परिजनों से आंख मिलाने तक की हिम्मत न कर पाएं।
  • यह डबल-मीनिंग संवादों, कामुक हाव-भाव और लगभग हर बात में सेक्सुअल अंडरटोन वाली फ़िल्म है। यहां तक कि इसका टाइटल गीत भी सेक्सुअल हिंट से लबरेज़ है। इसे देखते वक़्त बेहद खुले दिमाग़ की ज़रूरत है। उतना ही, जितना आप क़रीबी दोस्तों के साथ नॉन-वेज जोक्स सांझा करते वक़्त खुला रखते हैं। यानी, जो आप अकेले में सोचते हैं या जैसी बातें पक्के यारों के बीच बैठे कर लेते हैं, वह सब परदे पर नज़र आने वाला है।
  • दिमाग़ को घर छोड़कर ही जाना पड़ेगा। वरना, शरीर का 1200 क्यूबिक सेंटीमीटर आकार तथा 1.5 किलो वजन वाला यह सबसे संवेदनशील हिस्सा लगातार 135 मिनट तक तकलीफ़ देता रहेगा।
      निर्देशक इंद्र कुमार की यह फ़िल्म उन दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाई गई है जो हर बात को नैतिकता की कसौटी पर नहीं कसते और जिन्हें सेलफ़ोन पर सेक्स क्लिप्स डाउनलोड करके देखने में कोई गुरेज़ नहीं है। फ़िल्म देखते हुए एक सवाल अगर ख़ुद से पूछ लेंगे कि परदे पर जो तीन मुख्य किरदार दिखाए जा रहे हैं, क्या हम असल ज़िंदगी में वैसे नहीं होते? जवाब यही मिलेगा कि सोचते तो हम सब कमोबेश अमर (रीतेश देशमुख), मीत (विवेक ओबेरॉय) और प्रेम (आफ़ताब शिवदासानी) जैसा ही हैं, लेकिन उसे कहने या करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। सबसे ज़्यादा डर हमें व्यक्तिगत छवि तथा अपने नज़दीकी रिश्तों को खोने का रहता है। ...और जब-जहां ये डर नहीं होते, तब-तहां हम अपनी असलियत दिखाने का कोई मौका नहीं चूकते। एक मुखौटा हम हमेशा लगाए रहते हैं...और इस फ़िल्म या ऐसी ही दूसरी फ़िल्मों पर नैतिकता के सवाल उठाने वाले लोग उसी मुखौटे के पीछे छुपे रहने में सहूलियत महसूस करते हैं।
      फ़िल्म-मेकिंग के हिसाब से ग्रैंड मस्ती को आप अच्छे अंकों में ही पास करना चाहेंगे। अच्छे शॉट्स लिए गए हैं, जहां-तहां ख़ासकर अंतिम दृश्यों में विज़ुअल इफ़ेक्ट्स का बढ़िया इस्तेमाल हुआ है। अंत में इमारत की छत से लटकने के दृश्य में क्रोमा का प्रयोग किया गया है। ऐसे दृश्य क्रोमा तकनीक से ही बनते हैं, लेकिन ख़याल यह रखा जाता है कि देखने वाले को वे दृश्य असली लगें। जबकि, ग्रैंड मस्ती के इस सीन को अलग-अलग कोणों से देखने पर इसमें छुपी कृत्रिमता साफ़ झलकती है। जहां तक कलाकारों की बात है, तो फ़िल्म में इनकी भरभार है। आफ़ताब, रीतेश तथा विवेक के पास जो पात्र थे निभाने के लिए, उनमें वे जम रहे हैं। तीनों के चेहरे पर वासना बहती साफ़ नज़र आती हैं, ख़ासकर आफ़ताब के। अपने छोटे रोल के बावजूद सुरेश मेनन इस फ़िल्म का हाई-पॉइंट कहे जाएंगे। फ़िल्म में छह मुख्य महिला किरदार हैं, जिनमें बेहतर उपस्थिति करिश्मा तन्ना, सोनाली कुलकर्णी, मंजरी फड़नीस तथा मरियम ज़कारिया की ही रही है। ब्रूना अब्दुल्ला और क़ायनात अरोड़ा औसत ही हैं, उनसे बहुत उम्मीद नहीं लगाई जा सकती। फ़िल्म का संगीत तेज़ है, पर कर्णप्रिय है।

Saturday, September 7, 2013

चले आइए मनोंरजन की ‘ज़ंजीर’ से बंधने के लिए

आप एक अच्छी मनोरंजक फ़िल्म बनाते हैं तो फिर चालीस बरस पुरानी किसी हिट फ़िल्म के नाम का सहारा लेने की ज़रूरत कहां रह जाती है! क्यों एक फ़िल्मकार चाहता है कि उसकी रचना के हर कोण हर दृश्य को पुरानी फ़िल्म से तुलना करते हुए देखा जाए। ...और वह भी तब, जब उस पुरानी फ़िल्म की कहानी के ज़्यादातर बिंदु तो नई फ़िल्म में लिए गए हों, मगर नाम को सार्थक करता तर्क फ़िल्म में हो ही न। अपूर्व लखिया की ज़ंजीर एक ऐसी फ़िल्म हैं जिसमें दर्शक को आख़िर तक बांधकर रखने का माद्दा है। इसमें भरपूर मसाला है, एक्शन है, ड्रामा है, अच्छा अभिनय है...और सबसे बड़ी बात यह कि इसमें रफ़्तार है। 
      हिंदी सिनेमा के रचनाशील लोगों के बीच एक शब्द चलता है- वन लाइनर। यानी, फ़िल्म की कहानी का सार। इस मामले में देखें तो अपूर्व की ज़ंजीर चार दशक पहले आई प्रकाश मेहरा की ज़ंजीरका रीमेक कही जाएगी। अगर किरदारों के नाम की बात करें, तो भी यह फ़िल्म हमें चालीस साल पीछे ले जाती है। इसमें विजय खन्ना है, शेर ख़ान है, माला है, तेजा है, और साथ ही तेजा की मोना डार्लिंग भी है जिसका नाम इतना वक्त बीतने के बाद भी लोगों की ज़बान से उतरा नहीं है। लेकिन अगर स्क्रिप्ट की बात करें तो पुरानी ज़ंजीर’ के मुक़ाबले उसका नया अवतार बिल्कुल अलग है। इसकी स्थितियां अलग हैं, घटनाएं अलग हैं, और किरदारों के स्वरूप की परिकल्पना भी अलग ढंग से की गई है। कहानी को आज के वक़्त के हिसाब से ढाला गया है, जोकि इस ज़ंजीर को नया लुक दे जाता है...और यही बात फ़िल्म को अलग भी करती है।
      अभिनय, फ़िल्मांकन तथा एक्शन के मामले में फ़िल्म दाद देने लायक है। दक्षिण के सितारे रामचरण की यह पहली हिंदी फ़िल्म है। उनके काम की तारीफ़ देनी पड़ेगी। वह परदे पर न केवल बेहद सहज दिखे हैं, बल्कि बचपन में मां-बाप को खो चुके एक ईमानदार इंस्पेक्टर के अंदाज़ एवं जज़्बात को अच्छे से साकार किया है। वे तेलुगू सिनेमा के सुपरस्टार चिंरजीवी के बेटे हैं। उन्हें देखकर लगता है कि यदि अच्छे मौक़े मिले तो वह हिंदी फ़िल्मों में अपने पिता की असफलता का दाग़ धो डालेंगे। खलनायक तेजा की भूमिका में प्रकाश राज दमदार हैं, पर अगर आप उनकी तुलना पुरानी ज़ंजीर के अजीत से करेंगे तो कमीनेपन के मामले में प्रकाश को उन्नीस ही पाएंगे। प्रियंका चोपड़ा अमेरिका से भारत पहुंची माला बनकर परदे पर हैं। माला का पात्र ज़्यादा विविधता लिए नहीं है और उसकी अहमियत सत्तर के दशक की नायक-प्रधान फ़िल्मों की नायिका से अधिक नहीं है। फिर भी परदे पर प्रियंका की ताज़गीभरी मौजूदगी को आप नकार नहीं सकते। मोना के ग्लैमरस रोल में माही गिल को देखना सुखद है। अब तक वह ऐसी किसी भूमिका में नहीं दिखी हैं और उनके लिए यह स्वागत-योग्य बदलाव हो सकता है। हालांकि, फ़िल्म के आख़िरी हिस्सों में निर्देशक ने उनका इस्तेमाल केवल जगह भरने के लिए किया है। संजय दत्त हर दृश्य में असल पठान लगते हैं; प्राण साहब आज ज़िंदा होते तो वे संजय को ज़रूर शाबासी देते। कमिश्नर की भूमिका में चेतन पंडित और पत्रकार बने अतुल कुलकर्णी देखने लायक हैं। दोनों बेहद संयमित रहे हैं और अपने-अपने पात्रों के काफी क़रीब दिखे हैं।
      संगीत के मामले में फ़िल्म मार खाती है। गीतों के बोल साधारण हैं और धुनें औसत। वहीं, संवादों पर मेहनत किए जाने की गुंजायश भी दिखती है। पुरानी ज़ंजीर से एक-दो संवाद ले लेने से बात नहीं बन सकती...और न ही इस फ़िल्म में बन पाई है। कुल मिलाकर यह कि 137 मिनट की यह फ़िल्म दर्शक का अच्छा मनोरंजन ज़रूर कर जाती है। इसे एक महान फ़िल्म तो नहीं कहा जाएगा लेकिन एक अच्छी फ़िल्म ज़रूर कहा जा सकता है।