Thursday, March 7, 2013

आधी सदी बाद कैसे होंगे भारत के शहर

किसी परिचित जगह पर कुछ साल बाद जाओ तो एकबारगी सिर चकराना लाजिमी है। कोई भी ऐसी जगह जहां हमने लंबा वक्त बिताया हो; या कोई ऐसा शहर या कस्बा, जिससे इतने समय तक वास्ता रहा हो कि वहां के गली-मोहल्लों से हम जान-पहचान बना पाए हों... ऐसी किसी जगह से फिर से रू-ब-रू होते ही हमारी हैरानी से लबालब प्रतिक्रियाएं कुछ इस तरह से होती हैं- अरे, कितना बदल गया सब कुछ.. लग रहा है किसी नई जगह आ गया हूं! यहां पर तो सिनेमा हॉल होता था, यह मल्टीप्लेक्स कब बना! और वहां... वहां हफ्ते में दो बार सब्जी मंडी लगती थी न... अब ये बीस मंजिला हाउसिंग सोसायटी...! तो फिर सब्जी मंडी कहां लगती है...? क्या! वो लगती ही नहीं.. ! ओह... तो अब सब्जी की खरीदारी मेगास्टोर से हो जाती है... वाकई, बड़ी तरक्की कर गई यह जगह तो..!!’ वगैरह, वगैरह...। कुल जमा बात यह कि वो परिचित जगह भी हमें नितांत अजनबी लगती है, मानो हमारे कदम वहां पहली बार पड़ रहे हों।
यह तो तय है कि समय, हालात और जरूरत के मुताबिक परिवर्तन होने हैं, यह संसार का नियम है। लेकिन इन परिवर्तनों के साथ भी एक नियम जुड़ा है, और वो यह कि जो परिवर्तन हमारी आंखों के सामने होते हैं, जिन्हें हम रोज-ब-रोज देखते हैं, वो हमें महसूस नहीं होते क्योंकि हम हर गुजरते दिन उसे देखने के अभ्यस्त होते जाते हैं। लेकिन जब हम इन बदलावों को एक लंबी समयावधि के बाद देखें तो अंतर साफ महसूस होता है, सबकुछ बदला नजर आता है। उस पर यह कि जेट की रफ्तार से भाग रही इस दुनिया में इस तरह से अचंभित होने के मौके भी जल्दी-जल्दी मिल रहे हैं। पहले ऐसा दशकों बाद होता था, अब साल-छह महीने में होने लगा है। हम सोच भी नहीं पाते कि पूरा शहर अपना कलेवर बदल लेता है, उसकी हर रग नई ताल के साथ धड़कने लगती है; गांव अपना लबादा उतारकर नया आवरण ओढ़ लेता है, उसकी आबो-हवा नए अंदाज से बहती महसूस होती है; और महानगर... उनकी तो पूछिए मत... चंद महीनों में ही वहां एक अलग दुनिया बसी हुई नजर आती है। ऐसे में जरा सोचकर देखें कि 50 वर्ष बाद क्या होगा! कैसे होंगे हमारे शहर, क्या रूप-रंग होगा हमारे महानगरों का? यकीनन हम जूल्स वर्न या एच.जी. वेल्स की तरह बेहद वैज्ञानिक कल्पनाओं पर आधारित गल्पकथाएं तो नहीं कह पाएंगे, लेकिन अपनी सोच की टाइम मशीन पर बैठकर उड़ेंगे तो एक अलग ही नजारा हमारे सामने होगा, और भविष्य की वीथिकाओं में द इनविजिबल मैन की तरह तफरीह करने का रोमांच यकीनन चेहरे पर मुस्कराहट बनकर तैर जाएगा।

चलिए, चलते हैं 50 साल आगे
कुछ साल पहले लवस्टोरी 2050 नामक एक फिल्म आई थी, जिसमें आधा कथानक वर्ष 2050 का था। समयकाल के हिसाब से मुंबई महानगर की जो तस्वीर उसमें दिखाई गई थी, वह काफी अंचभित कर देने वाली थी। इसमें उड़ने वाली कारें थीं, कांच की 200 मंजिला इमारतें थीं, होलोग्राम्स वाले विज्ञापन थे, और रोबोट भी। यह एक साइंस फंतासी फिल्म थी। फिल्म में जो था, उसमें से कितना कुछ सच होने की गुंजायश है, इस बारे में यही कहा जा सकता है कि जिस तेजी से विज्ञान तरक्की कर रहा है और आए दिन नई तकनीक सामने आ रही है उसे देखकर वो तो छोड़िये उससे भी आगे सोचा जा सकता है। ...और हम तो यहां और 10 साल आगे की बात कर रहे हैं। लेकिन फंतासी के जादुई गलीचे पर उड़ने के बजाय हम यहां अपनी कल्पनाओं को आकार आज की ज़मीनी हकीकत के आधार पर देंगे।

ज़मीन से कई सौ मीटर ऊपर सांस लेंगे शहर
एक ऐसी जगह के बारे में सोचिए जहां वाहन ज़मीन से कई मीटर ऊंचाई पर चल रहे हैं! जहां भी नज़र घुमाओ, एक-दूसरे के ऊपर से गुजरती सड़कों का जाल दिखाई दे रहा है... मानो किसी दैत्याकार शरीर में धमनियां और शिराएं फर्राटे भर रही हों! आप अपने रेजिडेंशियल टॉवर की 12वीं मंजिल पर रहते हैं और आपकी बालकनी के पास से सड़क निकलकर जा रही है; बाहर जाने के लिए आपको नीचे जाने की ज़रूरत नहीं है, अपनी मंजिल पर ही बने पार्किंग एरिया से आप कार निकालते हैं और सीधे सामने वाली सड़क पर आ जाते हैं! एक इमारत से दूसरी इमारत में जाने के लिए स्काईवॉक हैं, और आपको हर बार ग्राउंड फ्लोर पर जाने की ज़रूरत नहीं है!  ज्यादा दूरी तय करने के लिए ऐसी लिफ्ट्स हैं जो जमीन के समानांतर चलती हैं।!
आज जिस रफ्तार से यातायात के साधन बेहतर होते जा रहे हैं और शहरों में फ्लाईओवर, मेट्रो ट्रेन, स्काई बस जैसे कॉन्सेप्ट तेजी से वास्तविकता का जामा पहन रहे हैं, उसे देखते हुए 50 साल बाद के शहरों की ऐसी कल्पना करना मुश्किल नहीं है। आबादी बढ़ने के साथ हर शहर के इन्फ्रास्ट्रक्चर पर दबाव बढ़ता जाना तय है। जमीन हमारे पास कम होती जा रही है। ऐसे में एक ही समाधान हमारे सामने बचेगा... आसमान का रुख करना और जमीन के नीचे जाना। कोलकाता में जमीन के नीचे मेट्रो ट्रेन 28 साल से चल रही है। दिल्ली की मेट्रो जमीन के अंदर भी है और जमीन से ऊपर भी। मुंबई में अजगर की भांति लहराते मेट्रो के ट्रैक आकार ले रहे हैं। चेन्नई, बंगलुरु, हैदराबाद जैसे शहरों में भी इसकी शुरुआत हो चुकी है। चंडीगढ़ जैसा योजनाबद्ध शहर जहां महानगरों की बनिस्बत आबादी और यातायात का दबाव कहीं कम है, वहां भी स्काई बस की परिकल्पनाएं मूर्त रूप लेने को तैयार बैठी हैं।
जहां तक रिहायशी इमारतों का सवाल है, वो भी अब आकाश को चूमने के लिए बेताब दिख रही हैं। महानगरों में तो ऊंचे टॉवर का चलन दो दशक पहले शुरू हो गया था, लेकिन अब छोटे शहरों ने भी इस तरफ कदम बढ़ा लिए हैं। उपलब्धता कम होने और मांग बढ़ने से जमीन महंगी होती जा रही है, तो अब हर छोटे-से-छोटे भूखंड का अधिकतम इस्तेमाल होने लगा है। कम एरिया में ज्यादा-से-ज्यादा घर बन रहे हैं। खाली जगहें कंक्रीट के जंगलों में दुबककर रह गई हैं। महानगरों में तो पुरानी छोटी इमारतों को तोड़कर टॉवर बन रहे हैं। पुराने सिनेमाघरों को गिराकर उनकी जगह मॉल-कम-मल्टीप्लेक्स बनाए जा रहे हैं। छोटे शहर भी इस दौड़ में पीछे नहीं हैं। वहां पुराने हाट-बाजारों की जगह शॉपिंग प्लाजा आकार ले रहे हैं। शहरों के भीतर की खाली जगहों पर कस्बेनुमा आवासीय इलाके उगते जा रहे हैं, जो एक तरह से आत्मनिर्भर हैं क्योंकि उनमें बैंक, स्कूल, बाजार सब कुछ हैं। 
सारा नजारा कुछ ही साल में बदल गया है। 50 साल बाद क्या होगा, इसका अनुमान लगाना बेहद आसान है। अभी शहरों में उपनगर और मोहल्ले होते हैं, तब शहरों के भीतर शहर होंगे। या यूं कहें कि न्यूयॉर्क शहर की तरह भारत में भी कई ऐसे महानगर होंगे जो शहरों से मिलकर बने होंगे। वैसे इसकी शुरुआत भी हो चुकी है। दिल्ली महानगर में गुड़गांव, फरीदाबाद, नोयडा व गाजियाबाद को शामिल करके देखा जाता है। वहीं, बृहद मुंबई में कितने ही इलाके ऐसे हैं जो ठाणे और नवी मुंबई जिलों में पड़ते हैं।  
जिस रफ्तार से शहर अपना रूप बदल रहे हैं, उसे देखकर कह सकते हैं कि आने वाले वक्त में भारतीय महानगरों की स्काईलाइन मैनहट्टन, टोक्यो या दुबई से अलग नहीं होगी। दुबई में मौजूद दुनिया की सबसे ऊंची इमारत बुर्ज खलीफा 830 मीटर ऊंची है और इसक 163 मंिलें हैं। इसमें ऑफिस हैं, होटल हैं, और रिहायशी अपार्टमेंट भी हैं। यह इमारत भविष्य की दुनिया की झलक है। 50 साल बाद भारतीय शहरों की शक्ल यकीनन इस झलक से मिलती-जुलती होगी

विश्वस्तरीय नए शहर भी होंगे हमारे आसपास
इधर, हमारे देश में कुछ समय से रियल इस्टेट कंपनियों के ऐसे विज्ञापन देखने को मिल रहे हैं जिनमें 21वीं सदी के विश्वस्तरीय शहर बसाने की बात कही जा रही है। ...और बड़ी बात यह कि लोग ऐसे प्रोजक्ट्स में बढ़-चढ़कर निवेश भी कर रहे हैं। लेकिन ये शहर महानगरों की सीमाओं के बाहर उन इलाकों में हैं जो फिलहाल ग्रामीण हैं, जंगलों में हैं, झीलों के किनारे या फिर हाईवे पर हैं। ऐसे शहरों को पूरी तरह बसाने की समय-सीमा भी ज्यादा दूर नहीं है.. यही कोई आज से सात-आठ साल बाद तक। ऐसे संभावित शहरों की रूप-रेखा देश के कोने-कोने में बन रही है.. आप चाहे दिल्ली से आगरा के बीच यमुना एक्सप्रेस-वे पर देख लें, ग्रेटर नोयडा के और गुड़गांव में सोहना रोड पर स्थित ग्रामीण इलाकों पर नज़र दौड़ा लें, मुंबई-पुणे एक्सप्रेस तथा तथा मुंबई-गोवा हाईवे पर बन रहे टाउनशिप्स के बारे में जानकारी ले लें, या फिर महाराष्ट्र की सहयाद्रि पहाड़ियों के भीतरी इलाकों में एम्बी वैली और लवासा सिटी जैसे बड़ी परियोजनाओं का उदाहरण ले लें। हर जगह भविष्य के बेमिसाल शहरों के बीजांकुर फूट चुके हैं। कल्याण के बाहर कोंकण रेलवे के साथ-साथ कई लाख एकड़ में पलावा सिटी की बात की जा रही है, जिसमें आवासीय इमारतों के अलावा मेट्रो रेल, शॉपिंग मॉल्स, खेल के मैदान, होटल, स्कूल, क्लब हाउस, पार्क इत्यादि सब होंगे।
पुराने शहरों में नया विकास करने के मुकाबले ऐसे शहरों में सहूलियत यह है कि इनमें जगह की कोई कमी नहीं है और, क्योंकि सारा काम शून्य से शुरू होना है, तो इन्हें आने वाले समय और जरूरतों के हिसाब से योजनाबद्ध तरीके से विकसित किया जा रहा है। ये शहर छोटे-बड़े गांवों की कीमत पर बन रहे हैं और जिन लोगों की जमीन ली जा रही है उन्हें इन शहरों में घर दिए जा रहे हैं। ऐसे में हम 50 साल आगे देखें तो बेखटके कह सकते हैं कि कितने ही गांव अपना अस्तित्व खोकर शहरों में बदल गए हैं और उनमें रहने वाले लोग बिना कहीं गए शहरी हो गए हैं।

आबादी भी छोड़ेगी गहरी छाप
भारत के शहरों की शक्ल पर तकनीक, विकास और जुनून का जितना असर नजर आएगा, कमोबेश उतना ही असर आबादी का भी होगा। यह सवाल सामने हमेशा रहेगा कि जिस रफ्तार से नित नए रंग हमारे शहरों में भरे जा रहे हैं, क्या वो उस शहर की आबादी के लिए काफी हैं? पिछले साल आबादी पर आई यूनायटेड नेशन्स की एक रिपोर्ट में अनुमान है कि वर्ष 2025 में हम आबादी के मामले में चीन को पीछे छोड़ देंगे और आज से 50 साल बाद यानी वर्ष 2060 तक भारत की आबादी 172 करोड़ तक जा पहुंचेगी। इसके बाद यह कम होनी शुरू हो जाएगी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि तब तक भारत के 54 फीसदी लोग शहरों में रह रहे होंगे। यानी, भारत.. जिसके बारे में कहा जाता है कि वो गांवों में बसता है, वह 50 साल बाद शहरों में बसने लगेगा। तय है कि बढ़ी हुई आबादी की जरूरतें पूरी करने के लिए उसी अनुपात एवं रफ्तार से मूलभूत सुख-साधन भी बढ़ाए जाएंगे। तय है कि इसका असर विकास पर पड़ेगा।
जरूरतें किसी भी तरह के विकास का प्रेरक बल है। विश्व के विकसित देशों को देखें तो वहां का विकास लोगों की जरूरतों को पूरा करने की धुन का परिणाम है। लेकिन जो मूल अंतर हमें अपने यहां देखने को मिलता है, वो यह है कि हम आज की जरूरत के हिसाब से विकास करते हैं, जबकि विकसित देशों में विकास 25-30 साल बाद की जरूरतों के मुताबिक किया जा रहा है। नतीजा यह होता है कि जब तक विकास का अगला चरण पूरा होता है, तब तक शहर की जरूरतें बढ़ जाती हैं। तो क्या हम 50 साल बाद ऐसे शहरों में होंगे, जहां हर तरह की सहूलियतें तो होंगी लेकिन उनका पूरी तरह से आनंद लेने के लिए हमारे पास स्पेस नहीं होगा। स्काईवॉक होंगे, फ्लाईओवर होंगे, मेट्रो रेल का जाल होगा, कई सौ मंजिला इमारतें होंगी, लेकिन इनका हर कोना लोगों से भरा होगा।

...लेकिन महानगरों की तरफ पलायन कम होगा
अगर यह अनुमान थोड़ा परेशान करने वाला है कि 50 साल बाद भारत के 54 फीसदी लोग शहरों में बसेंगे, तो यह हकीकत बेहद सुखद भी है कि गांवों के कस्बों में और कस्बों के बड़े शहरों में बदलने की वजह से देश में शहरों की तादाद बढ़ जाएगी। यानी, 50 साल बाद 54 फीसदी आबादी को संभालने के लिए शहरों की संख्या आज के मुकाबले कहीं ज्यादा होगी। महानगरों में भीड़ लगातार बढ़ने की एक बड़ी वजह यह है कि ग्रामीण इलाकों की अपेक्षा शहरों, खासकर महानगरों में रोजगार और जीवन-यापन के बेहतर साधन होते हैं। लोग शहरों का रुख करते हैं और शहर इतने तैयार नहीं होते कि वो एक सीमा से ज्यादा लोगों को संभाल पाएं। लेकिन गांव जब शहरों में बदलेंगे तो वहां रोजगार के साधन भी बढ़ेंगे और जीवन-स्तर भी ऊंचा उठेगा। यह बात बड़े शहरों और महानगरों में उस आबादी को कम करेगी जो पलायन की वजह से बढ़ती है। तो तय है कि इसका सकारात्मक असर वहां के इन्फ्रास्ट्रक्चर पर पड़ेगा। बड़े शहरों के विकसित ढांचे का इस्तेमाल करने के लिए उतने लोग नहीं होंगे, जिनकी हम आज अपेक्षा कर रहे हैं। तो क्या हम आने वाले 50 सालों में बड़े नगरों में उन लोगों को ज्यादा देखेंगे जो कई पीढ़ियों से वहां रह रहे हैं? अनुमान तो कुछ ऐसी तस्वीर ही पेश कहते हैं।

सोच का कायांतरण कर पाएंगे क्या?
इस सवाल के जवाब पर पहुंचने से पहले देश के सबसे बड़े महानगर मुंबई की सड़कों पर दिखे इन दो नज़ारों के बारे में पढ़ लीजिए... पहला नज़ारा है वहां के बेहद व्यस्त इलाके लोखंडवाला के सबसे गहमागहमी वाले बाज़ार का। इस इलाके में रहने वाले ज्यादातर लोग पढ़े-लिखे और धनाढ्य हैं। शाम के वक्त एक मंहगी कार की पिछली सीट पर बैठे तीन बच्चे आइस्क्रीम खा रहे हैं। आइस्क्रीम खत्म होने पर एक बच्चा अगली सीट पर बैठे अपने पापा को खाली कप दिखाकर पूछता है कि कहां डालूं। पापा हाथ बढ़ाकर कार का पिछला दरवाजा खोलते हैं, और आंख के इशारे से बेटे को खाली कप सड़क पर गिराने को कहते हैं। आप ऐसे बच्चों से बड़ा होने के बाद क्या उम्मीद कर सकते हैं, जिनके मां-बाप की यह इच्छा तो यकीनन है कि वो बेहतरीन स्कूल में पढ़ें, लेकिन यह फिक्र कतई नहीं कि बच्चा क्या सीख रहा है। दूसरा नज़ारा मलाड इलाके में लिंक रोड का है। एक तेज भागती कार लाल बत्ती पर रुकती है, शीशा नीचे होता है और एक हाथ प्लास्टिक के तीन गिलास बाहर फेंक देता है। ये दोनों उदाहरण उस शहर के हैं जहां आज भी लोगों में इतनी तहजीब है कि वो लोकल बस के लिए लाइन में खड़े होते हैं। अगर वहां यह हाल है तो बाकी महानगरों में क्या होता होगा जहां पर शिष्टाचार की बातें आबादी के अथाह सागर में गुम हो चुकी हैं।
इसके बनिस्बत अब यह तस्वीर देखिए... घुमक्कड़ तबीयत का होने के नाते कई बार मेरा देश के बाहर जाना हुआ है। मलेशिया, थाईलैंड और सिंगापुर जैसे देश हमसे ज्यादा दूरी पर नहीं हैं, लेकिन वहां सड़कें कांच की तरह चमकती हैं। सिंगापुर जैसे देश में आप किसी सार्वजनिक स्थान पर कागज़ का टुकड़ा तक नहीं फेंक सकते। ऐसे करने वाले को जेल तक हो सकती है, जुर्माना लगना तो तय है। कुआलालम्पुर एक देश की राजधानी है, लेकिन वहां सड़कों पर शोर-शराबा रत्ती भर भी नहीं है; ट्रैफिक सिग्नल पर आप हरी बत्ती होने का इंतजार करते हैं, पर आगे वाले को चेताने के लिए हॉर्न नहीं बजाते हैं। किसी दुकान या मॉल में जाने के लिए कितना ही चलना पड़े, लेकिन गाड़ी पार्किंग में ही लगाई जाती है। साल के किसी भी दिन सैलानियों से भरे रहने वाले शहर बैंकॉक में लोग कुछ खा कर रैपर सड़क पर नहीं उछालते, बल्कि कूड़ेदान में डालते हैं। अगर कोई सैलानी ऐसा करेगा तो बहुत संभव है कि कोई स्थानीय व्यक्ति उसे आकर टोक दे।
समय के साथ रूप-रंग में बदलाव आना एक बात है, और उस बदलाव के साथ सोच का बदलना दूसरी बात। अक्सर इन दोनों बातों का विरोधाभास हमें ऐसे दोराहे पर ला खड़ा कर देता है कि हम अपने सफर के रोमांच और रास्ते की खूबसूरती को महसूस ही नहीं कर पाते। अपने देश के किसी भी शहर, कस्बे या महानगर में निकल जाएं... सड़कों, गलियों, चौराहों, बस व रेलवे स्टेशनों और सार्वजनिक परिसरों में हमें गंदगी और कूड़े-करकट की हुकूमत नज़र आ जाएगी। असल में हम साफ रहना नहीं जानते... हमारे लिए सफाई के मायने ये हैं कि हम अपने घर को साफ कैसे रखें। घर की बुहरन घर के बाहर गली में डालने में हमें कोई गुरेज नहीं... मानो गली, मोहल्ला, शहर हमारे हैं ही नहीं। जबकि सच यह है कि आज की भागती-दौड़ती जीवनशैली में हमारा समय घर में कम और बाहर ज्यादा गुजरता है। अगर आज यह हालत है तो 50 साल बाद क्या होगा, अगर हम सोच नहीं बदलेंगे? तब, जब हमारे शहरों पर आबादी का बोझ बढ़ चुका होगा और जिंदगी कहीं ज्यादा तेज हो चुकी होगी?

Wednesday, March 6, 2013

...जब मिटता चला गया डेढ़ सहस्राब्दी का अंतराल

उस्ताद शुजात खान। इमदादखानी घराने के उस्ताद शुजात खान मशहूर सितारवादक उस्ताद विलायत खान के बेटे हैं।
पूरा वातावरण किक था। एक तरफ कोई पंद्रह सौ बरस पुरानी गुफाओं में बने हिंदू मंदिर तथा बौद्ध चैत्य जो कभी मंत्रोच्चार से गुंजायमान रहते होंगे... और एक तरफ संगीत की लहरों में प्रतिध्वनित होती शामें जिन्हें सुरों के अनूठे मिलन ने एक अभूतपूर्व दिव्यता प्रदान कर दी। आत्मा वही थी; स्वरलहरियों के कोलाहल के बीच चित्त में जा घुलने वाली शांति भी संभवतया एक-सी थी; एक लय में बहती ध्वनियों के माध्यम से मन तथा मस्तिष्क में गहरे उतर जाने वाली निस्तब्धता की अनुभूति वहां यकीनन पहले भी रही होगी; नृत्यकला की विभिन्न भाव-भंगिमाओं के आलोक में कंदराओं के पत्थर पहले भी आह्लादित हुए बिना नहीं रहे होंगे। यदि कोई अंतर महसूस हो रहा था तो डेढ़ सहस्राब्दी के उस अंतराल मात्र का जो इन दो समयकालों को अलग कर रहा था। 
बीते सप्ताहांत अरब सागर में मौजूद एलिफेंटा द्वीप पर संगीत व कला की अभिव्यक्तियां अपने चरम पर थीं। यहां हर साल होने वाले एलिफेंटा महोत्सव को इस बार बौद्ध एवं हिंदू स्थापत्यकला के उन बेजोड़ नमूनों की निगाहों के समक्ष आयोजित किया गया था जो सदियों से अपनी भव्यता के मद में शान से खड़े हैं। महोत्सव में शामिल होने आए दिग्गज कलाकारों को भी निश्चित ही यह अहसास रहा होगा कि वो जहां आए हैं वहां उनका कला-प्रदर्शन एक ध्यानयोग के अतिरिक्त कुछ हो ही नहीं सकता। तभी तो उन्होंने सुर-लय-ताल के माध्यम से श्रोताओं को जिस सम्मोहन में जकड़ा, उससे निकलने में शायद उन्हें लंबा वक्त लगेगा।
शास्त्रीय गायन में मग्न श्वेता पंडित। हारमोनियम पर संगत कर रहे हैं उनके पिता एवं संगीतकार पंडित विश्वराज।
महोत्सव की शुरुआत का जिम्मा संगीतकारों के उस परिवार की नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती श्वेता पंडित पर था, जिसने पंडित जसराज जैसे लोग संगीत-जगत को दिए हैं। श्वेता ने सधे सुरों में मां काली की राग-आधारित वंदना से समारोह को सटीक आरंभ दिया, तो इसके बाद राग बागेश्री में पिरोकर प्रियतम को लौट आने का उनका आह्वान सुरों के परों पर सवार होकर कहीं दूर जाता महसूस हुआ। श्वेता ने अपने स्वरों को जहां विराम दिया, वहां से संगीत-जगत के दिग्गजों ने ऐसा सिरा पकड़ा कि सांझ का धुंधलका रात के आगोश में जाना मानो भूल ही गया। सितार पर उस्ताद शुजात खान की अंगुलियां का जादू चला, तो मन का हर कोना रोशनी से भर उठा। लेकिन यहां कमाल सितार की ध्वनियों का ही नहीं था। भारतीय एवं जैज संगीत के फ्यूजन के लिए दुनियाभर में मशहूर अमेरिकी संगीतज्ञ जॉर्ज ब्रूक्स जिस खूबसूरती से सितार की धुन में सैक्सोफोन के सुर मिला रहे थे, वो जल-थल की सीमाएं पार करता लगा। इस जुगलबंदी में कार्नाटिक संगीत के बड़े नामों में शामिल वायलिन-वादक कुमरेश व गणेश और खंजीरा-वादक पी. सेल्वगणेश भी मोती पिरोते रहे। हिंदोस्तानी, कार्नाटिक व जैज संगीत का अनमोल मिश्रण थी यह पेशकश।
नृत्यांगपार्वती दत्ता की अगुवाई में 'सन्निधि' के कलाकारों ने एक साथ सात शास्त्रीय नृत्यों का संगम पेश किया।
समारोह के पहले दिन का समापन हुआ सन्निधि से जिसमें देश के सात शास्त्रीय नृत्यों का संगम था। पं. केलुचरण महापात्र तथा प. बिरजू महाराज की शिष्या पार्वती दत्ता के अगुवाई में सात नृतकों के थिरकते पांवों तथा सुरुचिपूर्ण भाव-भंगिमाओं ने मंच को मानो नई प्राण-ऊर्जा से भर दिया। हालांकि, समय कम मिल पाने की वजह से अपनी कला को कांट-छांट कर पेश करने की पीड़ा सन्निधि के कलाकारों के चेहरे पर साफ झलक रही थी।
रंजीत बारोत और उनके साथियों ने पूरे माहौल को चमत्कृत कर दिया। रंजीत मशहूर नृत्यांगना सितारा देवी के बेटे हैं।
मखमली आवाज़ के मालिक डॉ. प्रभाकर कारेकर अपने शास्त्रीय गायन से मन के सितार को झंकृत करते चले गए।
रविवार शाम को महोत्सव के दूसरे दिन का आगाज प्रख्यात शास्त्रीय गायक डॉ. प्रभाकर कारेकर के सुरों से हुआ। लाल रंग होरी खेलूं...गीत से उनकी मखमली वाणी जहां गुलाल की तरह उड़कर मानस-पटल को रंगती चली गई, वहीं सांवरे, आये जइयो जमुना किनारे सुनकर लगा कि अगर कान्हा कहीं आस-पास होते तो राधा की इतनी करुण पुकार सुनकर अवश्य दौड़े चले आते। शुद्ध भारतीय शास्त्रीय संगीत की इस रस-मंजूषा के बाद बारी फिर से फ्यूजन की थी। मशहूर कथक नृत्यागंना सितारा देवी के बेटे तथा अंतरराष्ट्रीय पटल पर फ्यूजन म्यूजिक के ध्वजावाहकों में एक रंजीत बारोत और उनके साथियों ने शाम को अलग ही रोमांच से भर दिया। वीणा पर पुण्या श्रीनिवास, बांसुरी पर अश्विन श्रीनिवास तथा गिटार पर आदित्य बेनिया की जुगलबंदी ने ढोल पर रंजीत बारोत की थिरकती अंगुलियों से निकली ताल के साथ मिलकर जो जादू फेरा, उससे एलिफेंटा की कंदराओं में उकेरी तांडव करते शिव की पाषाण प्रतिमाएं निश्चित ही प्राणवान होकर थिरक उठी होंगी। 
उत्सव का समापन हुआ नृत्य की पेशकश से। कथक में सूफी संगीत के मिश्रण का अनूठा प्रयोग करने वाली जानी-पहचानी नृत्यांगना मंजरी चतुर्वेदी के नृत्य-कौशल से वातावरण अभिभूत हो उठा। कथक नर्तक पंडित अर्जुन मिश्रा की शिष्या तथा लखनऊ घराने की मंजरी ऐसी अकेली कलाकार हैं जिन्होंने सूफीवाद की रहस्यात्मकता को नृत्य की विधा में पिरोया है। सूफी गायन की स्वरों में लिपटे उनके मंत्रमुग्ध कर देने वाले नृत्य के अतिरिक्त शायद ही कोई अन्य पेशकश इस महोत्सव के समापन के लिए उपयुक्त होती जोकि उस जगह हो रहा था जो कभी दो धर्मों के आध्यात्मिक उद्यम का साक्षी रहा है।

Thursday, February 28, 2013

यात्राएं और प्रेम

यात्राएं हमारे जीवन को फिर से शक्ति एवं प्यार से सींच देती हैं।
-रुमी, प्रख्यात फारसी कवि
जब हम किसी यात्रा पर जाते हैं तो अपना घर बेशक कुछ समय के लिए छोड़ते हैं, पर मन के मैल को हमेशा के लिए कहीं दूर छोड़ आते हैं। हम स्वभाव से निर्मल होकर लौटते हैं; जीवन के सटीक मायनों को समझकर लौटते हैं; हम स्वयं से और पूरी कायनात से प्रेम करना सीखकर लौटते हैं।

जाने-माने अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन ने जब यह लिखा कि- यात्रा करना पूर्वाग्रह, धर्मान्धता और संकीर्णता के लिए घातक है’, तो उनका इशारा यही था कि यात्राएं आपको भीतर से झाड़-पोंछकर ऐसा बना देती हैं कि आप प्रेम को अनुभव कर सकें, प्रेम को इसके वास्तविक मायनों में जी सकें। प्रेम करने का आधार ही यह है कि हम निश्छल हों; जिससे प्रेम करें उस पर पूरा भरोसा हो; और प्रेम की महक से तन-मन को सराबोर करने के लिए उन्मुक्त मन से उसका स्वागत करने को तैयार खड़े हों। मन में सवालों की घुंडियां होंगी, तो प्रेम कहां घर बना पाएगा? किसी भी बात को लेकर असहनशील होंगे तो किसी को प्यार से कैसे गले लगा पाएंगे? अपने को दूसरे से बेहतर मानते रहकर दिमाग़ के किसी कोने में अंदेशे पाले रहेंगे, तो किसी के दिल को कैसे छू पाएंगे? क्या संभव है कि जब हम ख़ुद अपने चारों ओर जाला बुनकर बैठे हों, उसमें उलझे हुए कसमसा रहे हों, तो हम किसी को आलिंगन में भर पाएं? क्या छोटी-छोटी बातों में, बेमानी सवालों में अपने आपको जकड़े रखकर मोहब्बत जैसे उत्कृष्ट एवं सार्थक भाव को छूने भर के भी लायक होते हैं हम?
      बदकिस्मती यही है कि हम प्यार-मोहब्बत की सोचते तो हैं, लेकिन अपने दिलो-दिमाग के पेचों से निकल ही नहीं पाते। असल में हम घर से ही नहीं निकल पाते। खुद को एक सुरक्षा घेरे में जकड़े रखकर ही हमें राहत महसूस होती है। यह मानकर चलते जाते हैं हम कि ख़तरों से सुरक्षित रहने में ही जीने की सार्थकता है। इस दुनिया में जीना शुरू करने के बावजूद हम कही-न-कहीं सुरक्षा के उस एहसास में डूबे रहना चाहते हैं, जो हमें तब महसूस होता है जब हम अपनी मां की कोख में होते हैं। कोख का वह सुरक्षित घेरा जब छूटता है तो हम रोते हैं। ड़ा होने पर हम रोते बेशक नहीं हैं लेकिन एक सुरक्षा घेरा अपने आस-पास बुने रखने में राहत ज़रूर महसूस करते हैं। तिस पर, बड़ा होते जाने के साथ-साथ पचासों नकारात्मक भावों से अपने को जकड़ते जाते हैं।
      घर से निकलना और यात्राओं पर जाना हमारे डर को दूर तो करता ही है, हमें भीतर से निर्मल भी करता जाता है और हमें प्रेम के क़रीब ले जाता है। जाने-माने अमेरिकी लेखक, धर्म-विचारक एवं रहस्यवादी ग्लेन क्लार्क ने इस बात को कुछ इस तरह से व्यक्त किया है- यात्रा करने से पहले सारी कुढ़न, शंका, ईर्ष्या, स्वार्थ और डर को पीछे छोड़कर जाएं, तो आपकी यात्रा हल्की और लंबी होगी। यही बात प्रेम के लिए कहें तो? ब्रिटिश निबंधकार एवं उपन्यासकार पीको अय्यर ने कुछ यही कहा है कि यात्राएं किस तरह से हमें बदलती हैं और कैसे वो सब बदलाव प्रेम के लिए भी आवश्यक हैं। पीको कहते हैं- यात्रा करना प्रेम करने के समान है, क्योंकि य जागरूकता का वो चरम स्तर है जहां पहुंचकर हम सचेत एवं ग्रहणशील हो जाते हैं और बदलने के लिए तैयार होते हैं।
      यकीनन! प्रेम में और कुछ दरकार ही कहां है? इसके लिए हमें अपने जीवन में या अपने आस-पास या दुनिया में किसी दूसरे के अस्तित्व के प्रति सचेत ही तो होना है, उसकी इच्छाओं को महसूस ही तो करना है। कितना सरल है प्रेम का दर्शन! कितना साधारण, कितना सुरुचिपूर्ण! और हम इसे कितना जटिल बनाए रखते हैं, कितने उलझे हुए तरीके से इसके समक्ष संबोधित होते हैं। प्रेम चाहे अपने से विलग मजहब से हो, समाज से हो, परिवार से या मित्रों से हो, या फिर किसी एक व्यक्ति से... सारी दिक्कतें इस बात पर आती हैं कि हम ख़ुद को श्रेष्ठ मानते हुए, अपनी सोच को बेहतर मानते हुए सामने वाले के अस्तित्व को नकार देते हैं। हम कहीं यह स्वीकार करने से इनकार कर देते हैं कि सामने वाले का अपना एक व्यक्तित्व है, उसकी एक सोच है, इच्छाएं हैं।

श्रेष्ठता का भ्रम टूटने पर उपजता है प्रेम
यात्राएं हमें उन जगहों पर ले जाती हैं जहां दुनिया की विशालता हमारे सम्मुख होती है, ज़िंदगी विभिन्न रंगों में हमारे सामने सांस ले रही होती है। ख़ूबसूरत क़ुदरती नज़ारे हमारा स्वागत करते हैं। उस विशालता, उस सुंदरता के सामने श्रेष्ठ होने का हमारा भ्रम कहीं गलने लगता है। हर बीतते पल के साथ, हर एक नई यात्रा के साथ हम वास्तविकता के धरातल पर आने लगते हैं, अपने को सही मायनों में पहचानने लगते हैं। अपना सही-सही मूल्यांकन करते हैं हम, और पाते हैं कि अरे, मैं सब जैसा ही तो हूं! सब मेरे जैसे हैं, कोई भेद-विभेद नहीं हैं... फिर काहे की अकड़? यह कैसे भ्रम में जी रहा था मैं! जिस कुदरत के मैं रू-ब-रू हूं, वो उसी ईश्वर की रचना ही तो है जिसने ये सारी कायनात रची है। जिस तरह य सारी कुदरत ख़ूबसूरत है, उसी तरह य सारी दुनिया और इसमें रहने वाले लोग भी तो ख़ूबसूरत हैं। मशहूर फ्रेंच लेखक एवं मादाम बोवेरी जैसी महान कृति के रचनाकार गुस्ताव फ्लॉबर की कही एक बात में, हमारे व्यक्तित्व पर यात्रा के इस असर का पूरा सार समाहित है। उन्होंने लिखा- यात्राएं हमें विनम्र बनाती हैं, क्योंकि हम जान जाते हैं कि इस संसार में हमारा अस्तित्व कितना सूक्ष्म है।
      और यह जानते ही हम बदलने लगते हैं। विनम्रता हमें प्रेम करने और पाने के लायक बनाती है। अहंकारी इन्सान कहां किसी प्रेम कर पाते हैं या प्रेम हासिल कर पाते हैं। वो एक झूठ में जीते हैं और एक दिन उसी झूठ में लिपटे दम तोड़ देते हैं। वो तो खुद से भी प्रेम नहीं कर पाते। जब हम विनम्र होते हैं, तो संवेदनशील होते हैं और प्रेम पाने व देने लायक होते हैं। यात्राएं हमारे भीतर यही बदलाव लाती हैं लेकिन यह बदलाव कितना स्थायी होता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम जीवन में इस बदलाव की कितनी सार्थकता देखते हैं, इसकी अनमोल होने का कितना अंदाज़ा लगा पाते हैं। लेकिन यह तय है कि बार-बार घर छोड़कर सफर पर निकलने और इस पूरी कायनात में गुम होने से यह असर स्थायी ज़रूर होने लगता है।
अमेरिकी लेखिका एवं आलोचक लिलियन स्मिथ ने हमारे जीवन में यात्राओं की अहमियत को यह कहकर रेखांकित किया है कि- मैंने जल्दी ही समझ लिया कि कोई ऐसी यात्रा नहीं जो हमें दूर ले जाती हो, क्योंकि किसी सफर के दौरान जितना दूर हम आस-पास की दुनिया में निकलते हैं, उतनी ही दूरी हम अपने भीतर की दुनिया में भी तय करते हैं। लिलियन के कहने का अर्थ स्पष्ट है। यात्रा के दौरान जितनी सुंदरता हम अपने आस-पास देखते हैं, उतनी ही सुंदरता हमारे भीतर पैदा होती है; जितना प्रेम हम प्रकृति से और इसके नज़ारों से करते जाते हैं, उतना प्रेम हमारे भीतर भी उपजता जाता है।

सहनशील बनाकर प्रेम सिखाती हैं
किसी भी रिश्ते की लंबी उम्र के लिए ज़रूरी है कि हम सहनशील हों, और यह सहनशीलता प्रेम का ही तो एक रूप है। जिनसे हम प्रेम करते हैं, उनके लिए हम नरम होते हैं, लचीले होते हैं, उनकी भली-बुरी बातों को बिना किसी हाय-तौबा के अवशोषित करते हैं। जिनसे प्रेम करते हैं उनकी बातें अक्सर बुरी भी नहीं लगतीं, उनके कामों में मीन-मेख नहीं निकालते हम, उनकी बातों के अन्यथा अर्थ भी नहीं तलाशते। इसे यूं कहें कि जहां सहनशीलता है, प्रेम भी वहीं है, सद्भाव भी वहीं है। हमारे भीतर सहनशीलता का भाव पैदा करने में यात्राओं की कितनी बड़ी अहमियत है, इसका दृष्टांत अमेरिकी रचनाकार एवं कवयित्री माया एंजलो की बात से लग जाता है। माया कहती हैं-शायद यात्राएं हमारे भीतर की धर्मान्धता को न मिटा पाएं, लेकिन यात्राओं के दौरान जब हम यह जानते हैं कि दुनिया का हर इन्सान रोता है, हंसता है, खाता है, फिक्रमंद होता है, और मर जाता है; तो ये हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि यदि हम कोशिश करें और एक-दूसरे को समझें तो कम-से-कम दोस्त बनकर तो रह ही सकते हैं।
      माया का तर्क एक बड़े स्तर पर प्रेम की बात करता है। उस स्तर की, जब हम इन्सान को इन्सान समझकर प्रेम करते हैं, उसके मजहब, जाति, समुदाय के संकीर्ण दायरों से निकलकर उसे प्रेम करते हैं। मार्क ट्वेन की ही बात करें तो वो यह भी मानते थे कि- इन्सानों के बारे में विस्तृत, स्वस्थ एवं हितकारी दृष्टिकोण जीवनभर के लिए धरती के एक कोने में बैठे रहने से नहीं बनते। ट्वेन का इशारा यही है कि यदि हम हर तरह की वर्जनाओं से निजात पाकर इन्सान से प्रेम करना चाहते हैं, प्रेमभाव से रहना चाहते हैं, तो हमें सफर पर निकलना होगा। एक मूरिश कहावत भी तो है कि बिना सफर पर निकले कोई व्यक्ति इन्सान की क़द्र करना जान ही नहीं सकता। जब इन्सान की क़द्र करना नहीं जान पाएंगे तो उसके जज़्बात की क़द्र करना कैसे जानेंगे? और जब किसी के ज़्बात की क़द्र नहीं कर पा रहे हैं तो फिर बजाते रहो प्रेम की बीन।

भरोसा करना सिखाती हैं
प्रेम का आधार है भरोसा, प्रेम का पोषण है भरोसा.. जहां हम दूसरे पर भरोसा नहीं कर सकते, वहां प्रेम नहीं हो सकता और यदि प्रेम होने के बाद भरोसा डगमगाने लगे तो भी प्रेम की नैया डूबी समझिए। यात्राएं हमें किसी पर विश्वास करना सिखाती हैं। किसी यात्रा से लौटे अजनबी इन्सान से पूछिए कि यात्रा पर जाने से पहले वो क्या था और लौटने पर वो कैसा हो गया है। वो मुस्करा देगा; एक अजनबी होने के बावजूद मुस्करा देगा। यह मुस्कराहट प्रमाण है इस बात का कि वो आपको अजनबी नहीं मान रहा है। आप भी एक अनजानी-सी गर्माहट महसूस करेंगे। यह गर्माहट यात्रा ने पैदा की है। इटेलियन कवि, उपन्यासकार एवं अनुवादक सिज़ारे पावेज कहते हैं-यात्रा क्रूरता है जो आपको घर एवं मित्रों से मिलने वाली सारी सुविधाओं से वचिंत करके अजनबियों पर भरोसा करना सिखाती है। और अगर हम अजनबियों पर यकीन कर सकते हैं, तो उन पर क्यों नहीं जो हमारे अपने हैं, हमारे आस-पास हैं, हमारे रोज़ की ज़िंदगी के हमराह हैं? उन पर भरोसा करेंगे तो प्रेम भी उपजेगा, चाहे फिर वो किसी भी धर्म को मानता हो, किसी भी विचारधारा का हो, किसी भी पंथ या समुदाय से संबंध रखता हो। हमारा उससे जो रिश्ता होगा वो प्रेम का होगा।

जीवन से प्रेम बढ़ाती हैं
यात्रा हमेशा आगे की तरफ होती है, वो पीछे नहीं लौटती। हम जहां से चलते हैं वहां लौटकर आते हैं, तो भी वो यात्रा की गतिशीलता का ही पड़ाव है। जब हम यात्रा पर होते हैं तो लगातार गतिशील होते हैं, किसी मोड़ पर ठहरते भी हैं तो भी हम यात्रा में होते हैं। यात्राओं की तरह प्रेम भी अवरुद्ध होकर नहीं रहता; न ही प्रेम ऐसे लोगों के हृदय में जगह बनाता है जो ठहरे पानी की तरह होते हैं। प्रेम की सार्थकता भी इसकी निरतंरता में है। यात्राएं हमारे भीतर निरंतरता का भाव भरती जाती हैं, और समय बीतने के साथ यही हमारा स्थायी भाव बनने लगता है। जीवन के प्रति एक सकारात्मक नज़रिया पैदा होता है, जो हमारे प्रेमभाव में भी झलकने लगता है। कैसे नकारात्मक रह सकता है वो इन्सान, जो घर से निकलने की हिम्मत जुटा पाया हो? कैसे डरता रह सकता है वो मनुष्य जो सफ़र की चुनौतियों से जूझने का माद्दा रखता हो? कैसे स्वयं से कटा रह सकता हो वो व्यक्ति जो बेपरवाह होकर सारी कायनात से जुड़ने निकला हो। हम सफर पर जाते हैं तो हमारी आंखें कुछ नया देखने लगती हैं। फ्रेंच लेखक, निबंधकार एवं आलोचक मार्सल प्रूस कहते हैं- खोज की वास्तविक यात्रा नई जगहें देखने में नहीं है, बल्कि नया नज़रिया बन जाने में है। हमारे भीतर नया दृष्टिकोण पैदा होते ही हमें ज़िंदगी सार्थक दिखने लगती है। हम जीवन से प्रेम करने लगते हैं।
      जब हम किसी यात्रा पर होते हैं, तो यह ज़रूरी नहीं कि हमारा हर पल ख़ुशनुमा या बेहद सुविधाजनक ढंग से बीते। अक्सर ऐसे अनुभव भी होते हैं जो हमारे सामने चुनौतियां पेश करते हैं। हम उन चुनौतियों से जूझते हैं और आगे बढ़ते जाते हैं। हम जानते हैं कि हर जगह यह स्थिति नहीं रहने वाली। आगे रोशनी है, फूल हैं, ठंडी बयार है। लेकिन यही रास्ता जीवन का हो और मुश्किल हालात से जूझते हुए हम घर के एक कोने में बैठे किस्मत को कोस रहे हों, तब? बीते वक्त के घावों को इस तरह से सहेजकर बैठे हों कि आगे की खुशियां भी न देख पा रहे हों, तब? क्या वो प्रेम है स्वयं से? कतई नहीं। लेकिन इस दौर में एक यात्रा, सिर्फ एक लंबी यात्रा आपको बिना कहे सिखा जाती है कि छूट चुका रास्ता या अभी का रास्ता कितना भी कष्टकारी हो, आगे के पड़ाव पर रंग हैं उल्लास है। ...और हम अचानक स्वयं के प्रति प्रेम का नया भाव जगाकर एक नई उर्जा के साथ आगे बढ़े चले जाते हैं। अमेरिकी इतिहासविद मिरियम बिएर्ड ने इस बारे में कहा है- यात्रा नज़ारे देखने के अलावा भी बहुत कुछ है। यह जीवन को जीने के तरीके की सोच में आया बदलाव है जो कहीं गहरे और स्थायी रूप से चलता रहता है। इसी बदलाव के लिए ही तो लेखक एवं पत्रकार एलिजाबेथ गिलबर्ट, जो दुनियाभर में चर्चित हुए उपन्यास ईट, प्रे, लव की रचयिता है, कहती हैं कि यात्रा करने के लिए कोई भी कीमत या बलिदान कम है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस बलिदान के बदले में हम प्यार पाते हैं। गिलबर्ट ने अपने इस उपन्यास में एक तरह से अपनी कहानी को ही उतारा है। एक नायिका जो जीवन में प्रेम ढूंढ रही है और उसे प्रेम तब मिलता है जब वो खुद को अपने ही बंधनों से आज़ाद करती है और सफर पर निकलती है।

संवेदनाएं जगाती है हर यात्रा
प्रेम का एक और मूलमंत्र है- संवेदनशील होना। हम जन्मजात संवेदनशील नहीं होते, जीवन के अनुभव हमारे भीतर इस भाव के स्तर को तय करते हैं। यात्राएं वो भांति-भांति के अनुभव हमें देती हैं, जो यह तय करते हैं कि हम किसी स्थिति में कैसे प्रतिक्रिया करेंगे और किसी की ज़रूरतों एवं स्थितियों को लेकर कितना संवेदी होंगे। ये अनुभव तब आते हैं जब हम लोगों से मिलते हैं, उनके बारे में जानते हैं, उन्हें समझते हैं, उनके हालात का मूल्यांकन करते हैं। किसी कुएं के मेंढक की तरह जीवन गुजारकर हम ये अनुभव नहीं ले सकते। और जब तक हमें ये अनुभव नहीं होंगे, हम दूसरों के मानसिक हालात को नहीं समझ पाएंगे, तब तक हम निश्चित होकर नहीं कह सकते कि हम वाकई प्रेम कर सकते हैं।
यात्रा कैसे आपको कुछ सोचने-विचारने पर मजबूर करती है, इसका अनुभव मैंने स्वयं लिया है। घुमक्कड़ी के अपने शौक के चलते मेरे पैर का चक्का चलता रहता है। पिछले बरस यह चक्का कंबोडिया में जाकर थमा। य वो देश है जहां कई बरस तक खमेर रूज का शासन रहा और उस दौरान एक-चौथाई जनता या तो मार डाली गई या भूख-प्यास से दम तोड़ गई। य 1970 के दशक के अंत की बातें हैं। वहां आज बहुत कम लोग हैं जो 50-55 बरस की उम्र के हैं, क्योंकि तीस साल पहले खमेर शासन की बर्बरता की सबसे ज्यादा शिकार युवा पीढ़ी हुई थी। लेकिन तब भी वो ख़ुशमिजाज दिखे, अपने गुज़रे वक्त के मातम से आगे बढ़कर वर्तमान को गले लगा रही है। जब उन्हें देखा-समझा-जाना, तो एहसास हुआ कि कितनी बेहतर स्थिति में हैं हम, कहीं ज्यादा ख़ुशकिस्मत हैं उनसे। यह जानकर अपने पर रश्क हुआ। ...और जब हम अपने जीवन की सकारात्मकता की क़द्र करना जान जाते हैं तो दूसरों के हालात को भी बेहतर समझ पाते हैं। प्रेम के लिए नितांत ज़रूरी है कि हम जिनसे प्रेम करते हैं उके मानसिक एवं भावनात्मक हालात को च्छी तरह से समझ सकें, आत्मसात कर सकें। प्रेम पाने और देने के लिए हमें सवंदेनशील होना होता है, और यह काम यात्राएं बखूबी करती हैं। जानी-मानी मानवशास्त्री मार्ग्रेट मीड की यह बात यात्राओं और प्रेम के आपसी संबंध को रेखांकित करने के लिए बेहतरीन है- एक यात्री जो घर से एक भी बार बाहर निकला है वो उस इन्सान से ज्यादा समझदार है जो कभी घर की देहरी भी नहीं लांघा... क्योंकि किसी दूसरी संस्कृति का ज्ञान हमारी समझ को पैना करता है और साथ ही अपनी संस्कृति तथा अपने लोगों को अधिक प्यार से समझने की क्षमता देता है।

यह आलेख 'अहा ज़िंदगी' पत्रिका के 2013 के  प्रेम महाविशेषां में प्रकाशित....