Friday, February 6, 2015

साल का अब तक का बेहतरीन फिल्मी तोहफा

फिल्मकार आर. बाल्की की जादुई पोटली एक बार फिर खुली है, और इस बार इसमें से पूरी शानो-शौकत तथा ढोल-धमाके के साथ निकली है शमिताभशमिताभ में डबल डोज़ है; यह दानिश और अमिताभ का संगम के तौर पर सामने आती है। डबल डोज़, यानी डबल मज़ा। लेकिन यहां मज़ा कई गुणा है। अब आप पूछेंगे कि कैसे? तो जवाब यह है कि शमिताभ का हर पहलू जानदार है- इसकी अवधारणा से लेकर कथानक की बुनावट तक, पटकथा से लेकर संवादों तक, अभिनय से लेकर संगीत तक। आप सचेत होकर खामी निकालने बैठेंगे तो एक अच्छी पेशकश का मजा लेने का मौका जाता रहेगा। ...और फिल्म देखने के बाद जब अवचेतन मस्तिष्क को खंगालेंगे तो फिल्म की बहुत-सी खूबसूरत बातों का मिश्रण चेहरे पर मुस्कान तथा मन में संतुष्टि का भाव ला देगा।
      शमिताभ का जब ट्रेलर जारी हुआ था तो इसके धीमी रफ्तार से चलने वाली एक बोझिल-सी फिल्म होने का अक्स जहन में बना था। लेकिन शमिताभ जब अपने पूरे आकार में सामने आती है तो रूह को खुश करती है। फिल्मी दुनिया में मुकाम बनाने का जुनून पाले एक गूंगे लड़के दानिश की आवाज अमिताभ सिन्हा नामक एक असफल अभिनेता के बनने और फिर उनके अहम आपस में टकराने को रेखांकित करती शमिताभ शुरुआती तेजी के बाद बहुत जगह धीमी भी होती है, लेकिन यह फिल्म की सहज-स्वाभाविक गति है। गूंगे दानिश के किरदार में धनुष इस कदर समाये हैं कि एक समय बाद उन्हें किसी दूसरे की आवाज में बोलते देखना अटपटा लगता है; तो वहीं पकी दाढ़ी वाले और शराबी हो चुके एक कुंठित कलाकार अमिताभ सिन्हा के किरदार में रचे-बचे अमिताभ बच्चन को आप परदे से ओझल होते नहीं देखना चाहते हैं। एक समय बाद आपको दानिश से हमदर्दी होने लगती है और यही एक कलाकार के तौर पर धनुष और लेखक-निर्देशक के तौर पर आर. बाल्की की जीत भी है। अमिताभ का अभिनय जहां अभिभूत करता हैं, वहीं कहीं अवचेतन में आप यह भी सोचते हैं कि इस उम्र में अमिताभ अपने विविध किरदारों के जरिये जिस मोहपाश में हमें जकड़े जा रहे हैं, वह उस आकर्षण से अलग है जो सत्तर-अस्सी के दशक में तब बनना शुरू हुआ था जब उन्हें कमोबेश एक जैसे किरदार निभाने को मिल रहे थे। इन दोनों के अलावा, कमलहासन तथा सारिका की छोटी बेटी अक्षरा उन उम्मीदों को पूरा करती नजर आती है, जो उनकी बड़ी बहन श्रुति से लगाई गई थीं और जिनके पूरा होने का अभी इंतजार है। एक चुलबुली असिस्टेंट डायरेक्टर की भूमिका में अक्षरा अपनी सहजता एवं आत्मविश्वास से अचंभित करती हैं। कब्रिस्तान में अमिताभ सिन्हा के साथी के तौर पर अजय जाधव आपको हंसाते हैं और दर्शक के जहन में अपनी जगह बना लेते हैं। उनका अभिनय स्वाभाविक है और मौजूदगी असरदार।
      शमिताभ का गीत-संगीत भी जानदार है। अमिताभ की आवाज में पिडली-सी बातें... गुदगुदाता है, तो वहीं कारालिसा मोन्टीरो की आवाज में श श श श मी मी मी मी... ताजा हवा के झोंके की तरह लगता है। वैसे, शमिताभ की खूबसूरती इसके कथानक के नयेपन, हर पहलू को तराशने के साथ ही उनकी शानदार पैकेजिंग और इसकी मासूम किंतु दमदार पेशकश में है। इसमें आप किसी बहुत गहरे संदेश को तलाशने जाएंगे तो निराश होंगे। संदेश अगर है तो सिर्फ इतना कि अकेले हम अधूरे ही रहते हैं  हम संपूर्ण कभी नहीं हो सकते; आगे बढ़ने के लिए अपनी काबिलियत के साथ हमें दूसरों का योगदान भी चाहिए होता है; यदि दूसरों की भूमिका को अनदेखा कर हम इस मुगालते में जीने लगते हैं कि हमें किसी की जरूरत नहीं तो हम अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। वैसे, बेहद दार्शनिक होने के बजाय अगर शमिताभ को आप इस नजर से देखेंगे कि यह एक काल्पनिक कथ्य है जिसे बयान करने तथा जिसमें जज्बात पिरोये जाने में पूरी ईमानदारी बरती गई है, तो यकीन मानिए बहुत आनंद आएगा। 

Friday, January 30, 2015

एक सुलझा हुआ रहस्य

आखिर किसने की आयशा महाजन की हत्या? फिल्म रहस्य की कहानी इसी सवाल की धुरी पर घूमती है। टीनएजर आयशा के माता-पिता डॉक्टर हैं। शक की पहली सुई पिता की तरफ घूमती है और केस आखिरकार सीबीआई के पास चला जाता है।
क्या कहानी कुछ-कुछ नोएडा के सात साल पुराने आरुषि मर्डर केस जैसी लग रही है? यकीनन!! मोटे तौर पर फिल्म की कथावस्तु उसी मामले पर आधारित है, लेकिन रहस्य की परतें ठीक आरुषि हत्याकांड जैसी नहीं हैं। फिल्म के लेखक-निर्देशक मनीष गुप्ता ने कल्पनाशीलता के सहारे कहानी को अलग तरह के मोड़ दिए हैं और इस तरह वे एक अच्छी फिल्म बनाने में सफल रहे हैं। रहस्य की खासियत यह है कि यह आपको शुरू से अंत तक बांधे रखती है और कहीं भी अपनी पकड़ ढीली नहीं पड़ने देती। और जैसा किसी अच्छी मर्डर मिस्ट्री में होना चाहिए कि कातिल का अंत तक पता न चले... तो उस पैमाने पर भी यह फिल्म खरी उतरती है।
फिल्म की शुरुआत अपने ही बेडरूम में आयशा महाजन की खून से लथपथ लाश मिलने से होती है। इसके बाद हर नए दृश्य में नए-नए संदेह पैदा करते हुए कहानी आगे ले जाई गई है। इस दौरान मनीष जिस सफाई से महाजन परिवार से जुड़े हर व्यक्ति को संदेह के घेरे में लेकर आते गए हैं, वह काबिले-तारीफ है। उन्होंने तर्क का सहारा लिया है और अंत में पूरा मामला शीशे की तरह साफ होते वक्त संदेह के घेरे में आए व्यक्तियों की गतिविधियों का औचित्य साबित करने में वे सफल रहे हैं।
      अगर आप क्वीन ऑफ क्राइम’ कही जाने वाली ब्रिटिश लेखिका अगाथा क्रिस्टी की मर्डर मिस्ट्रीज पढ़ते रहे हैं, तो आपको रहस्य की बुनावट क्रिस्टी के कथानकों की तरह ही व्यवस्थित एवं अनुशासित लगेगी। वहीं, आपको रहस्य के नायक सुनील पारस्कर (केके मेनन) में क्रिस्टी के विश्वविख्यात किरदार हरक्यूल पोयरो की दिमाग की कोशिकाओं को तकलीफ देकर मामला हल करने वाले जासूस की झलक भी दिखेगी। और तो और, जिस तरह क्रिस्टी के उपन्यासों में पोयरो सभी संभावित कातिलों को एक साथ बुलाकर रहस्य से परदा उठाता है, वैसे ही रहस्य में पारस्कर भी कातिल का चेहरा सामने लाता है। यह अंदाज नया है और आपको पसंद भी आएगा। यह जरूर है कि पारस्कर अखरोट खाता रहता है, जबकि पोयरो ऐसा नहीं करता। तो क्या वहां आपको बात-बात पर गाजर चबाने वाले अपने देसी जासूस करमचंद की याद दिलाई जा रही है?
     जो भी है मगर रहस्य के जरिये मनीष एक सुलझी हुई फिल्म पेश करने में सफल रहे हैं। हालांकि, दूसरे हाफ में फिल्म थोड़ा ढीली पड़ती है जब सबकुछ बहुत तेजी से घटित होने लगता है। यहां मध्यांतर से पहले वाली गति को बरकरार रखा जाता तो बेहतर होता। फिल्म के बेहतर होने की वजह यह भी है कि हर कलाकार अपने किरदार में समाया है। अदाकारी के पैमाने पर यह फिल्म ऊंचे पायदान पर है। केके मेनन जैसे अदाकार को बेबी में जरा-सा रोल देकर जो नाइंसाफी की गई, उसकी कमी वे यहां बखूबी पूरी कर गए हैं। एक और खास बात यह कि इस फिल्म में कहीं गानों की गुंजायश नहीं थी और संगीत के आधार पर फिल्में सफल होने वाले इस दौर में भी रहस्य में कोई गाना नहीं रखा जाना हिम्मत ही नहीं अक्लमंदी का काम भी था। फिल्म के कम प्रचार के बावजूद अगर दर्शक यह फिल्म देखने सिनेमाघर तक जाएगा तो तय है कि निराश होकर नहीं लौटेगा।

ऊबाऊज़ादा, पकाऊज़ादा... आधे से ज्यादा इश्कज़ादा

अगर हवाईजादा के शुरुआती कुछ पलों में इसके शानदार सेट को देखकर आप मंत्रमुग्ध रह जाते हैं और बड़ी उम्मीदें बांध लेते हैं तो इसे आपकी ही गलती माना जाएगा, क्योंकि कुछ देर बाद आपका ऊब के समंदर में गोते लगाना और बार-बार झुंझलाहट से दो-चार होना तय है। पहले पौने घंटे तक आपको चार गाने सुनने को मिल जाते हैं। ऐसे में यदि खुद से यह सवाल करें कि आप फिल्म क्यों देख रहे हैं, तो यह सवाल कतई बेमानी नहीं होगा।
     पहले एक घंटे तक तो इसके नाम पर जाइए ही मत! 19वीं सदी के अवसान के दौर में आधारित हवाईजादा में आयुष्मान खुराना जिस अन्वेषक शिवकर तलपड़े का किरदार निभा रहे हैं, वो तब स्थापित होता है जब 157 मिनट की यह फिल्म आधी जा चुकी होती है। उससे पहले शिवकर नालायक किस्म के आशिक के तौर पर ही सामने आता है, जो अक्सर नशे में रहता है। उसका दिल सितारा (पल्लवी शारदा) नामक नर्तकी पर आता है, तो फिर वहीं अटका रह जाता है। पढ़ाई-लिखाई में फिसड्डी होने के बावजूद वह काबिल है, यह आप तब जान पाते हैं जब शास्त्री जी (मिथुन चक्रवर्ती) शिवकर के घर जाकर उसके कमरे में घुसते हैं। इशारा साफ है कि फिल्म की पटकथा में ही लोचा है और यही लोचा फिल्म को कच्चा निगल भी गया है।
हवाईजादा की कहानी इस दावे पर आधारित है कि विश्व का पहला विमान साल 1903 में अमेरिका के ओलिवर बंधुओं ने नहीं उड़ाया था, बल्कि इसे मुंबई के प. शिवकर तलपड़े ने वर्ष 1895 में ही बना लिया था। प. तलपड़े को वेदों तथा विमानशास्त्र का ज्ञाता माना जाता है। विभु पुरी लिखित एवं निर्देशित इस फिल्म में प. तलपड़े के किरदार को कैसे भी पेश किया गया हो, मगर हकीकत यह है कि फिल्म अपने ही मूल तत्व से लंबे समय तक वंचित रहती है।
असल में एक युवा की विमान बनाने की जिद के अलावा फिल्म की कहानी के लिए कुछ ज्यादा जुटाया ही नहीं जा सका है। ऐसे में लेखक ने न केवल इश्कबाजी को जरूरत से ज्यादा खींच दिया है बल्कि इसे गलत वक्त पर और बेहद हल्के ढंग से परोस भी दिया है। मिसाल के तौर पर- शिवकर के जज्बात मंजूर करने के लिए सितारा का तीन शर्तें रख देना, अंग्रेज अफसर का दांत उखाड़ देना, दोनों का घोड़े पर चढ़कर भागना- इन बचकाना बातों की वजह से न तो प्रेम की गहनता परदे पर दिखती है और न ही यह प्रेम शिवकर के लिए प्रेरणास्रोत बनकर सामने आता है। ऐसे में शुरुआत से ही फिल्म बिखरने लगती है; विभु इसे समेटने में नाकाम रहे हैं, जिस कारण यह बेवजह खिंचती चली गई है। इसके अलावा, शास्त्री जी के पीछे पुलिस दौड़ना, पतंगबाजी के दृश्य, दोस्त के साथ बार में डांस देखने जाना, स्वामी का शिवकर के समक्ष यक्ष की तरह चार प्रश्न रख देना जैसी फिजूल बातें ठूंसे जाने से साफ है कि फिल्मकार बहुत गहरे न जाते हुए सतह पर ही लंबे-लंबे डग भर रहा है।
फिल्म में गीतों की भरमार है। इसमें कदम-कदम पर गाने भरे हुए हैं जोकि बोझिलता बढ़ाते हैं।  अभिनय के नाम पर भी ऐसा कुछ नहीं है जिसका जिक्र किया जाए। आयुष्मान ने चेहरे पर जरूरत से ज्यादा हाव-भाव लाकर अपने अभिनय कौशल में कमी की भरपाई करने की कोशिश की है, पर इस कारण वे ज्यादातर समय कृत्रिम लगे हैं; कुछ कर दिखाने का बीड़ा उठा चुके युवा का जुनून उनकी अदाकारी से नहीं झलक रहा। पल्लवी कुछ जगह मोहक लगती हैं, पर अदाकारी के नाम पर उनकी झोली खाली ही रही है। मिथुन भी उस ऊंचाई पर नहीं हैं, जहां तक वे अपने किरदार को ले जा सकते थे। ऐसे में हवाईजादा एक ऐसी निरर्थक कोशिश के तौर पर सामने आती है, जो पहले-पहले अपनी आभा से प्रभावित तो करती है मगर आखिरकार ऊंची दुकान फीका पकवान से अधिक कुछ साबित नहीं हो पाती।