Friday, January 23, 2015

शक्लो-सूरत अच्छी मगर जीन कमजोर

फिल्मकार नीरज पांडेय की पहली दो फिल्मों ए वेन्सडे और स्पेशल 26 ने एक तरह से ऐलान कर दिया था कि नीरज ऐसे थ्रिलर बनाना पसंद करते हैं जिनमें देशप्रेम के जज्बे का समावेश हो और जो बहुत हद तक वास्तविक लगें। लेकिन क्या उस वास्तविकता को अचूक ढंग से पेश करने के लिए नीरज रिसर्च भी उतनी ही शिद्दत से करते हैं? या फिर यह कि रिसर्च के मामले में नीरज अब बेपरवाह, थोड़ा आत्मसंतुष्ट होने लगे हैं? उनकी नवीनतम थ्रिलर बेबी को देखने के बाद कुछ ऐसा ही सवाल मन में आता है, क्योंकि कई जगह हुई कुछ बड़ी चूकों ने एक अच्छी-भली फिल्म को उस स्वादिष्ट पुलाव की तरह बना दिया है जिसे खाते वक्त मुंह में बार-बार कंकड़ आते रहें।
      बड़ी चूकों तक जाने पहले फिल्म के इन दो संवादों पर गौर कीजिए। एक जगह टीवी रिपोर्टर कह रही है- इसलिए मुकदमा आगे के लिए रद कर दी गई है। भाईजान, मुकदमा आगे के लिए मुल्तवी होता है, रद नहीं होता; दूसरे, मुकदमा होता है होती नहीं। दूसरी जगह आतंकी बिलाल के लिए टीवी एंकर कह रही है- ‘बिलाल, जिसे कोर्ट वापस ले जाया जा रहा था, वे फरार हो गए। वाह, खूब इज्जत परोसी एक आतंकी के लिए, वो भी उस फिल्म में जिसका मूल देशप्रेम के जज्बे में निहित है।
अब आगे चलते हैं। इंटेलीजेंस चीफ फिरोज (डैनी) दिल्ली में हैं। वहीं, मुंबई में खुफिया एजेंट अजय (अक्षय) से मिलने आफताब नामक युवा आता है, जो उसे मुंबई में आईएसआई एंजेट का पता बताता है और आतंकी साठ-गांठ का भेद खोलता है। कार्रवाई तुरंत होनी है, पर दूसरे ही पल अजय को दिल्ली में फिरोज के सामने खड़ा दिखाया जाता है, वहीं तीसरे ही पल वह मुंबई में जीनत महल पर धावा बोलने जा रहा है। तो क्या अजय दिल्ली और मुंबई के बीच ट्रांसमिट हो रहा है?? यहां आपके मन में यह सवाल भी आता है कि क्या किसी दुश्मन देश के एजेंट का पता लगने के बाद उसे स्पेशल टीम यूं ही आजाद छोड़कर आ जाएगी?
फिल्म के असलियत के करीब होने पर बड़ा सवाल तब उठता है जब बेहोश पड़े आतंकी सरगना मौलाना को मेडिकल इमरजेंसी बताकर सऊदी अरब से भारत लाया जाना है। यहां इतिहाद एयरलाइन्स का जोर देकर जिक्र होता है। एतिहाद की सारी उड़ानें अबु धाबी होकर भारत आती हैं। तो क्या किसी खतरनाक खुफिया ऑपरेशन में जुटे लोग इतने अनाड़ी होंगे कि वो एक मोस्टवांटेड को सीधे भारत न लाकर उस देश में फ्लाइट बदलकर वापस लाएंगे जहां भेद खुलने का सबसे ज्यादा खतरा है? हम इसे किसी फिल्मकार की क्रिएटिव फ्रीडम कह सकते हैं। लेकिन ऐसे में बेबी के जरिये भारतीय खुफिया तंत्र की असल झलक पेश करने का दावा हवाई जरूर हो जाता है।
बेबी इससे पहले आई एक्शन-थ्रिलर फिल्मों से कथानक के स्तर पर बहुत अलग नहीं है। यह आपको चौंकाती नहीं है, लेकिन अभिनय के मामले में सब किरदार असलियत के बेहद करीब जरूर हैं। अक्षय अपने किरदार को पूरी तरह से जी रहे हैं और यही बात केके मेनन, डैनी, अनुपम खेर, तापसी पन्नू, मुरली शर्मा तथा सुशांत सिंह के अलावा पाकिस्तानी कलाकारों रशीद नाज तथा मिकाल जुल्फिकार के लिए भी बेखटके कही जा सकती है। तथ्यों के मामले में नीरज बेशक बहुत जगह चूके हों, मगर अन्य थ्रिलर फिल्मों के मुकाबले बेबी में नीरज दृश्यों के असली लगने के मामले में जरूर इक्कीस हैं। फिल्म खत्म के बाद आप मौलाना रहमान तथा उनके अनुयायियों के नारे लगाने वाले दृश्य, जीनत महल में जावेद से सच उगलवाने और जेल में वकार से सच निकलवाने वाले दृश्यों को अपने साथ लेकर जाते हैं। कुछ अच्छे एक्शन सीक्वेंस और 159 मिनट के लिए देशप्रेम के अहसास में डूबे रहने के लिए बेबी को देखने जाया जा सकता है। 

अच्छी थी सगाई लेकिन ठंडी रही विदाई

केवल चार साल बीते हैं जब इमेजिन टीवी पर अजित अंजुम का सीरियल लुटेरी दुल्हन आया करता था। कोई पांच महीने चलने वाले इस सीरियल में एक ठग परिवार गोद ली हुई बेटी बिल्लो से लोगों की शादी करवाता था और बिल्लो अगले दिन सारा माल-असबाब लेकर चंपत हो जाती थी। यह शो उत्तर भारत की कुछ असल घटनाओं पर आधारित था जो बाद में मीडिया में भी चर्चित हुआ था
ऐसे में जब आप ठीक इसी विषय पर बनी फिल्म देखने जाते हैं, तो यह उम्मीद लेकर जाते हैं कि बड़े परदे पर कथानक का लेवल भी बड़ा होगा और कुछ नया बी देखने को मिलेगा। फिल्म शुरू होने पर यह उम्मीद साकार होने के आसार भी नजर आते हैं। लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, उम्मीद का ग्राफ दरकने लगता है। अंत तक पहुंचते-पहुंचते फिल्म की पकड़ ढीली होती जाती है और बोझिलता महसूस होने लगती है। फिल्म केवल 100 मिनट की है, और अगर इतनी-सी देर में दर्शक ऊबने लगे तो फिर फिल्म यकीनन किन्हीं बड़ी खामियों की जकड़ में है।
डॉली की डोली के कमजोर होते जाने की दो वजहें साफ हैं। एक तो यह कि शुरू में फिल्म का जो स्तर राजकुमार राव अपने अभिनय से स्थापित करते हैं, उस स्तर को बाद में बाकी कलाकार संभाल नहीं पाते हैं। दूसरे, ठगी का तरीका एक ही है, तो पहली घटना के बाद आगे जाकर ऊब पसरना स्वाभाविक है। एक वजह यह भी है कि फिल्मकार ने कुछ जगहों पर हास्य का पुट देने की गैर-जरूरी कोशिश की है, लेकिन यह कोशिश हर बार निशाने पर नहीं बैठी है। अब चाहे वो डॉली (सोमन कपूर) की सोनू सेहरावत (राजकुमार राव) के साथ शादी में एंकर से उल्टी-सीधी अंग्रेजी बुलवाना हो, या फिर मनजोत चड्ढा (वरुण शर्मा) की शादी के वक्त उसके दोस्त का बेवजह चिपकते जाना हो। फिल्म में हास्य का पुट अगर कहीं आ पाया है तो वो सिचुएशनल ही है। यह या तो अर्चना पूरन सिंह के किरदार के साथ आता है या फिर डॉली के इश्क में सिर से पैर तक डूबे राजकुमार राव के किरदार के साथ। कहीं-कहीं वरुण शर्मा भी मुस्कराने को मजबूर करते हैं, मगर उन्हें संवाद बोलने के दौरान अपने हाव-भाव संवारने पर कड़ी मेहनत करनी होगी।
वैसे हाव-भाव के मामले में सोनम भी उन्नीस ही हैं। एक खूबसूरत ठग लड़की के किरदार में वह सटीक बैठी हैं, लेकिन अक्सर उनका चेहरा गूंगा रह गया है। मनोज जोशी का उपयोग ज्यादा नहीं हुआ है, पुलकित सम्राट साधारण हैं। अभिनय के मामले में कोई असर छोड़ता है तो पहली हैं अर्चना जो अपने पंजाबी महिला की भूमिका में पूरी तरह से डूबी हैं। दूसरे हैं हरियाणवी छोरे के किरदार में राजकुमार, जिन्होंने शायद अपनी भूमिका घोंटकर पी ली है। मो. जीशान अयूब आपको पीयूष मिश्रा की युवावस्था की झलक देते हैं, लेकिन अपनी भूमिका से वे एक संभावनाशील अभिनेता के तौर पर सामने आते हैं। लब्बोलुआब यह कि डॉली की डोली देखकर आप संतुष्टि का अहसास लेकर वापस नहीं जा पाते हैं।  

शराफत का फल मीठा होता है

पल-पल आते नए मोड़, कसी हुई पटकथा, महज छह किरदारों के आसपास घूमती कहानी, लगातार बनी हुई दिलचस्पी और शानदार अदाकारी... फिल्म 'शराफत गई तेल लेने' के बारे में कुछ बताने के लिए इतना काफी है। जिस तरह से इस फिल्म बारे में कम बात हुई, उसके मद्देनजर निर्देशक गुरमीत सिंह की यह फिल्म किसी अचंभे की तरह आपके समक्ष परत-दर-रत खुलती जाती है। फिल्म का यही 'आगे-क्या-होगा' वाला तत्व है जो इसकी खासियत है और फिल्म में रोमांच की पकड़ को कहीं ढीला नहीं होने देता।
एक अदद नौकरी के बलबूते जिंदगी बिताने और अपना आशियाना सजाने वाले किसी युवा के हाथ अचानक सौ करोड़ लग जाएं और वो अनजाने ही खुद को अंडरवर्ल्ड तथा हवाला के मकड़जाल में फंसा पाए, तो फिर सारे कस-बल निकलना तय है। दिल्ली में सैम (रणविजय सिंघा) के साथ फ्लैट शेयर कर रहे और एक आर्किटेक्ट कंपनी में नौकरी कर रहे पृथ्वी खुराना (जायद खान) के साथ यही होता है। एक-एक पैसा जमा करके शादी की तैयारियों में जुटे पृथ्वी के अकाउंट में एक दिन छप्पर फाड़कर पैसा बरसता है और इसके बाद शुरू होता है अपनी मंगेतर मेघा (टीना देसाई) को बचाने की जद्दोजहद में अंडरवर्ल्ड डॉन के इशारों पर नाचने का सिलसिला। कहानी नए-नए अप्रत्याशित मोड़ लेती है और इसकी रोचकता का पैमाना कहीं कम नहीं होने पाता। फिल्म की गति भी इस कदर संतुलित है कि कहीं भी बोझिलता महसूस नहीं होती।
'शराफत गई तेल लेने' में छह किरदार हैं। इसे पटकथा लेखक का काबिलियत कहेंगे कि उसने इन छह के इर्द-गिर्द 108 मिनट का कथानक बुन डाला। मुख्य किरदारों में जायद पूरी तरह से किरदार में हैं। हालात के चक्रव्यूह में फंसे एक शरीफ युवा की भूमिका को उन्होंने आत्मसात किया है और यह फिल्म उन्हें एक काबिल अभिनेता के रूप में सामने लाती है। एक समय बाद आपको यह याद ही नहीं रहता कि आप परदे पर पृथ्वी को नहीं बल्कि जायद खान को देख रहे हैं। जायद यहां शाबासी बटोर ले जाते हैं। वहीं टीना देसाई और रणविजय के लिए भी यह फिल्म अभिनय करियर का अहम पड़ाव साबित होगी। टीना में आप आने वाले कल की एक सरल-सहज अदाकारा का चेहरा देखते हैं, बशर्ते उन्हें अच्छे मौके मिलते रहें। फिल्म इंडस्ट्री में पांच साल गुजारने के बाद अब रणविजय भी खम ठोंककर अपने आगे के दावे पेश कर सकते हैं। इन तीनों के अलावा फिल्म के अन्य कलाकार अनुपम खेर, यूरी तथा टालिया बेन्टसन हैं। बाकी सब सहायक कलाकार हैं जो केवल रिक्त स्थान भरने के लिए हैं।
फिल्म आपको इसलिए भाएगी क्योंकि इसमें अभिनय पक्ष की मजबूती को पलभर भी नजरअंदाज नहीं होने दिया गया है। इसलिए फिल्म में नाटकीयता नहीं है बल्कि यह किसी सच्ची कहानी जैसी महसूस होती है। दूसरी बात यह कि इसमें शरीफ बनने का उपदेश नहीं है, बल्कि मुख्य किरदारों से जुड़कर उनकी नैतिकता को आप स्वयं भीतर समेटते हैं। फिल्म का संगीत खुशनुमा अहसास देता है और इसका एक गीत दिल का फंडा दिल को छूकर निकलता है। 'शराफत गई तेल लेने' को इसके हल्के-फुल्के मनोरंजन तथा शानदार अदाकारी के लिए जरूर देखा जाएगा।