Friday, May 8, 2015

पीकू पूरे मोशन में

जाने-माने हॉलीवुड डायरेक्टर अल्फ्रेड हिचकॉक ने एक बेहद पते की बात कही थी। वो ये कि एक कामयाब फिल्म बनाने के लिए केवल तीन चीजों की जरूरत है- स्क्रिप्ट, स्क्रिप्ट, और स्क्रिप्ट। अगर इशारा समझ रहे तो ठीक है... और अगर नहीं तो बताए देता हूं। फिल्म बनाने की कला के नजरिये से देखें तो 'पीकू' एक बेहतरीन फिल्म है, जो देखने वालों को हर हाल में पसंद आनी चाहिए। या कहें कि देखने वाले के दिल में उतर जानी चाहिए।
'पीकू' देखने के दौरान अगर खुद से यह पूछेंगे कि इसमें हीरो कौन है, तो जो पहला नाम ध्यान में आएगा वो इसकी स्क्रिप्ट राइटर जूही चतुर्वेदी का होगा। क्योंकि अगर फिल्म की कहानी देखेंगे तो ये बॉलीवुड के वनलाइनर कॉन्सेप्ट पर खरी उतरती है। वाकई, 'पीकू' की कहानी को एक ही लाइन में समेटा जा सकता है। अगर पारंपरिक नजरिये से देखें तो कहानी कुछ भी नहीं है। जो कुछ है वो इसके लम्हे हैं, जो शुरू से अंत तक आपको जोड़े रखते हैं; जो फिल्म के किरदारों में अापको अपनी ही झलक देखने को मजबूर करते हैं। इतना कि हर लम्हा आपको अपनी जिंदगी से चुराया हुआ लगता है...और इसके लिए आप जूही को मन ही मन दाद दिए बिना नहीं रह पाते।
फिल्म के दूसरे हीरो हैं इसके निर्देशक शुजित सरकार। 'पीकू' जैसे  वनलाइनर कॉन्सेप्ट पर फिल्म बनाने का बीड़ा उठाना वाकई हिम्मत का काम है और ऐसा वही इन्सान कर सकता है जिसे अपनी काबिलियत पर बेतरह भरोसा हो। शुजीत का ये भरोसा हम 'विकी डोनर' तथा 'मद्रास कैफे' में देख चुके हैं और अब 'पीकू' में भी उन्होने उसी भरोसे पर कमान संभाली है। नतीजा यह निकला है कि उनकी निर्देशकीय प्रतिभा पर दर्शक का भरोसा भी कहीं ज्यादा मजबूत हुआ है। इस कहानी को आप किन्हीं दूसरे फिल्म निर्देशकों के पास लेकर चले जाइए... ज्यादातर लोग आपको दरवाजे से लौटा देंगे। भला कौन चाहेगा ऐसी कहानी पर फिल्म बनाना जिसमें लगातार पेट की 'मोशन' को लेकर प्रलाप हो और बात सिर्फ इतनी हो कि एक बाप-बेटी उसी प्रलाप के बीच दिल्ली से कोलकाता तक सड़क के रास्ते जा रहे हैं! ऐसी कहानी की शूटिंग के दौरान तो कलाकार भी एकरस होकर निढाल पड़ जाएं। लेकिन शुजित ने यहां भी बाजी मारी है और कलाकारों से बेहतरीन काम लिया है।
पूरी फिल्म में एकरस बातें होने के बावजूद कलाकारो के अभिनय में कहीं भी एकरसता नहीं है, बल्कि अभिनय में विविधता की वजह से हर दृश्य अलग और अनोखा लगता है। कलाकारी  के मानदंड इतने ऊंचे हैं कि एक समय बाद आप किरदारों से नाता जोड़ बैठते हैं, उन्हें चाहने लगते हैं। वो परदे पर चलते फिल्मी किरदार नहीं रहते, बल्कि आपके समक्ष एक जीती-जागती दुनिया हो जाते हैं। भाष्कोर बैनर्जी नामक सठिया चुके और फिर से एक जिद्दी बच्चा बन चुके बूढ़े (जो एक बच्चे की तरह इतना पजेसिव है कि बेटी को भी अपने से एक पल के लिए दूर नहीं देखना चाहता) की भूूमिका में आप अमिताभ बच्चन को लगातार देखते रहना चाहते हैं।
अभिताभ किस ऊंचाई पर हैं इस फिल्म में, इसका अंदाजा इससे लग जाएगा कि एक चिड़चिड़ाहट पैदा करने वाले किरदार को भी आप प्यार करने लगते हैं। वहीं उनकी बेटी पीकू के रूप में दीपिका को देखकर यूं लगेगा मानो वो बरसों से इस किरदार की तैयारी कर रही हों, इसे जी रही हों। पिछले कुछ साल से हर अगली फिल्म के साथ एक बेहतर अदाकारा के तौर सामने आती हैं दीपिका। इन दोनों के साथ इरफान भी पूरे रंग में हैं। वह एक टैक्सी सर्विस के मालिक की भूमिका में हैं। बेहद स्वाभाविक, बेहद सहज... इरफान की कलाकारी के लिए ये दो बाते आप कह सकते हैं।
इन तीन के अलावा बाकी कलाकार भी अपने चोले में है औ यह बात फिल्म को और मजबूत कर जाती है। इसके लिए जिम्मेदार हैं जोगी, जो कास्टिंग डायरेक्टर के तौर पर हर किरदार की रूह में उतरकर शानदार कलाकार चुन कर लाए हैं। वहीं, फिल्म के संवाद चुटीले हैं और पटकथा की खूबसूरत बारीकियों तथा इसके लम्हों को एक सूत्र में पिरोने का काम करते हैं। फिल्म के गीत मधुर हैं और इन्हें आप विषयवस्तु के सार का प्रेषक कह सकतेहैं। इन्हें आप सूत्रधार के संवादों का संगीतमय रूप भी कह सकते हैं।
लब्बोलुआब यह कि 'पीकू' एक कमाल की फिल्म है जिसे छह लोगों- जूही, शुजित, अमिताभ, दीपिका, इरफान तथा जोगी के लिए तथा पूरे परिवार के स्वस्थ मनोरंजन के लिए जरूर देखा जा सकता है।

Friday, April 3, 2015

हमारे दिमाग के पेंच कौन सुलझाएगा???

अभी कुछ देर पहले दिबाकर बनर्जी की फिल्म डिटेक्टिव ब्योमकेश बक्शी देखकर लौटा हूं और लगातार दिमाग की उलझनें सुलझाने में व्यस्त हूं। ये उलझनें तभी बनना शुरू हो गई थीं जब मैं सिनेमाहॉल में बैठा फिल्म देख रहा था। दिबाकर का ये जासूस किरदार बेशक अपने दिमाग की ग्रे सेल्स का इस्तेमाल करते हुए दो-जमा-दो-चार करके चुटकियों में किसी भी मामले की परतें खोल देता हो, मगर दिबाकर अपनी फिल्म में दिखाना क्या चाह रहे हैं, इस राज की परतें खोलने में तो मेरे दिमाग की चूलें तक हिली जा रही हैं। न भई न, मैं ब्योमकेश बक्शी नहीं हूं। ...और न ही मैं वैसा ब्योमकेश होना ही चाहता हूं जिसे दिबाकर सिनेमा के परदे पर लेकर आए हैं।
फिल्म बांग्ला लेखक शरदेंदु बनर्जी के लोकप्रिय जासूस पात्र ब्योमकेश बक्शी पर आधारित है। ब्योमकेश को लेकर भारत में फिल्में बनती रही हैं। दिबाकर की फिल्म शरदेंदु बनर्जी की पहली कहानी सत्यान्वेषीपर आधारित है जिसे उन्होंने साल 1932 में लिखा था। हालांकि, कोलकाता के एक हॉस्टल में घटित होती इस कहानी और इसमें अंजाम दी गई हत्याओं को डिटेक्टिव ब्योमकेश बक्शी में दस साल आगे ले जाते हुए दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान कोलकाता पर संभावित जापानी हवाई हमले तथा अंतरराष्ट्रीय ड्रग माफिया का मुलम्मा चढ़ाकर पेश किया गया है। दिबाकर ने एक सीधी-साधारण कहानी को इस कदर पेंच दे दिए हैं कि ये आखिरकार देखने वाले के दिमाग की नसों को जख्म देने के सिवा कुछ और नहीं करते।
चलिए, डिटेक्टिव ब्योमकेश बक्शी को एक आसान से सवाल की कसौटी पर कसते हैं। आखिर ब्योमकेश का किरदार इतना लोकप्रिय क्यों हो पाया? जवाब यह कि वो किरदार उन कहानियों का हिस्सा रहा जिनमें रहस्य-रोमांच तो था लेकिन जिनकी बुनावट बेहद सरल थी; जिन कहानियों के सब किरदारों –नकारात्मक या सकारात्मक- के व्यवहार के पीछे मूल इन्सानी प्रवृत्तियां असल वजह होती थीं। लेकिन दिबाकर की फिल्म के तकरीबन सभी किरदारों (अंगूरी को छोड़कर) को इन्सानी तबीयत नहीं बल्कि हालात हांकते दिखते हैं। पूरी फिल्म के दौरान आप किसी किरदार जुड़ ही नहीं पाते। यूं कहें कि वे किरदार आपको असल ही नहीं लगते। तिस पर, एक वैज्ञानिक की हत्या की छानबीन के बीच चीनी ड्रग माफिया, कोलकाता पर कब्जे करने के जापानी मन्सूबे, वहां रहते दूसरे देश के भेदिये, कोलकाता-का-किंग-कौन जैसी चाहत में भेस बदलकर रहता एक विदेशी हत्यारा, स्वतंत्रता संग्राम की लपटें, इन लपटों में कूदने को तैयार युवा... इन सबको मिलाकर डिटेक्टिव ब्योमकेश बक्शीके नाम पर जो घालमेल परोस दिया गया है वह किसी होटल में अनाड़ी शेफ के हाथों बनी मिक्स्ड वेजिटेबल से ज्यादा कुछ नहीं लगता है। फिल्म देखते वक्त आप इस सच से भागना चाहते हैं कि यह फिल्म उसी फिल्मकार की है जिसने खोसला का घोंसला से शुरुआत करते हुए लगातार अच्छी फिल्में भारतीय सिनेमा को दी हैं।
यह भी है कि अगर आप एकबारगी फिल्म के उलझाव एवं ऊब भरे कथानक को एक तरफ रख दें, तो इस बात की तारीफ किए बिना नहीं रह पाएंगे कि परदे पर दिबाकर 70 साल पहले के दौर को रचने में बखूबी कामयाब रहे हैं। किरदारों के पहनावे, लोकेशन्स तथा कलर-इफेक्ट के जरिये उन्होंने उस दौर को शानदार ढंग से चित्रित किया है जिसमें वे कहानी कह रहे हैं। कलाकारों के चयन से लेकर अदाकारी तक फिल्म इक्कीस नजर आएगी। डॉ. गुहा के किरदार में नीरज कबि उल्लेखनीय हैं, जिनकी ‘शिप ऑफ थीसियस के बाद दूसरी दमदार पेशकश देखने को मिली है। सुशांत (ब्योमकेश), आनंद तिवारी (अजित बनर्जी) तथा स्वास्तिका मुखर्जी (अंगूरी) भी आपकी दाद ले जाएंगे। बस, अगर इतना होता कि दिबाकर इसकी कहानी को सहज-सरल रखते और यह सोचते कि सारे मसाले एक ही फिल्म में क्यूं डालूं, आगे और भी तो फिल्में बनानी हैं,’ तो यह फिल्म यकीनन कुछ और हो सकती थी।

Friday, March 20, 2015

इस शिकारी के सब तीर निशाने पर

ज़िंदगी में हम कितना भी भटक लें, शारीरिक ज़रूरतें पूरी करने के पीछे कितना भी लगे रहें, लेकिन आख़िरकार हमारे लिए जो सवाल मायने रखेगा, वो यह कि क्या कोई ऐसा इन्सान है हमारी ज़िंदगी में जो हमसे वाकई प्यार करता है... एक ऐसा साथी जिस पर हम इतना भरोसा कर सकें कि हमें कभी झूठ का लबादा ओढ़कर न जीना पड़े?”
इस गंभीर-सी लगने वाली बात को संदेश के तौर पर लेकर चली फ़िल्म हंटर सेक्स संबंध बनाने को बेसब्र रहने वाले युवा मंदार की ज़िंदगी के जरिये एक चुलबुली पेशकश के तौर पर सामने आती है। इतनी चुलबुली कि हंटर अपने पूरी अवधि के दौरान हल्के-फुल्के मनोरंजन का अच्छा ज़रिया साबित होती है। इसकी ख़ूबसूरती यह है कि इसका विषय सेक्स पर केंद्रित होने के बावजूद यह सेक्स मसाले से भरपूर फ़िल्म नहीं है, बल्कि सेक्स के आदी हो चुके एक युवा की क़शमक़श को परदे पर लाती है।
फ़िल्म का कथानक मंदार (गुलशन देवैया) नामक इंजीनियर के आस-पास घूमता है, जो यौन संबंधों को लेकर अपने आजाद ख़यालात की वजह से दोस्तों के बीच बेहद चर्चित है। फिल्म में बार-बार फ्लैशबैक में जाकर मंदार की ज़िंदगी की परतों में झांका जाता है जहां हमें एक युवक के सेक्स का आदी होते जाने तथा उसके सेक्सुअल एन्काउंटर्स की झलकियां मिलती है। वहीं वर्तमान में उम्र बढ़ने के साथ मंदार का धीरे-धीरे सेक्स से मोहभंग होने का चित्रण है। इसकी एक बड़ी वजह उसका तृप्ति (राधिका आप्टे) से उसका जज़्बाती तौर पर जुड़ते जाना है, जिससे वह शादी करके आखिरकार सेटल हो जाना चाहता है।
मंदार की ज़िंदगी का उलझा हुआ ताना-बानाहंटर की पटकथा का आधार है, जिसे लेखक ने सुलझे हुए तरीके से पिरोया है। फ़िल्म की एक बड़ी ख़ासियत यह है कि एक बिंदास लेकिन गंभीर विषय पर होने के बावजूद इसकी पेशकश हास्य से भरपूर है जो न तो हमें कहीं उबासी लेने देती है और न ही हमारे सामने नैतिकता के सवाल आते हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह इसके चुटीले संवाद हैं, जो हमें हंसाते रहते हैं। नहीं, नहीं! यह ग्रैंड मस्तीटाइप की सेक्स कॉमेडी नहीं है; इसमें डबल-मीनिंग फूहड़ संवाद नहीं ठूंसे गए हैं। हंटर के संवाद स्वाभाविक हैं और सिचुएशनल भी, जिन्हें हम अपने आस-पास बोलते-सुनते रहे हैं। वो हमें अजीब नहीं लगते, बल्कि अप्रत्याशित होने की वजह से वे गुदगुदा ज़रूर जाते हैं।
रिलीज़ से पहले हंटर को सॉफ्ट पॉर्न श्रेणी की फ़िल्म बताया जा रहा था, लेकिन अपनी सवंदेनशील प्रस्तुति की वजह से यह एक अच्छी फ़िल्म के तौर पर सामने आती है। जहां तक इसके सेक्स कंटेंट का सवाल है तो वह लगभग हर बार सांकेतिक ही है। इसका एकमात्र बोल्ड दृश्य तब है जब मंदार अपनी पड़ोसन ज्योत्स्ना (साई तम्हाणकर) के साथ संबंध बनाता है। लेकिन वह दृश्य इतना स्वाभाविक बन पाया है कि कोई सवाल खड़े नहीं करता। फ़िल्म देखकर साफ हो जाता है कि इसके निर्देशक हर्षवर्द्धन कुलकर्णी अपनी सीमाएं न केवल जानते हैं बल्कि उन्हें निभाने का हुनर भी उनके पास है। हां, अपने आखिर में फ़िल्म को लंबा खिंचने से वे नहीं बचा पाए हैं, ख़ास तौर पर तब जब तृप्ति को सबकुछ बताकर लौट रहा मंदार दो बार काल्पनिक स्थितियां अपने चचेरे भाई दिलीप को बताता है। एक बार बताना मज़ेदार लगता है, उसे दोहराना चिड़चिड़ाहट पैदा करता है।
फ़िल्म में कलाकारों का चयन उम्दा है और लगभग सब कलाकार अपने किरदार में हैं। गुलशन अपने चरित्र की विभिन्न अवस्थाओं को बखूबी जी पाए हैं और गोलियों की रासलीला- रामलीला के बाद यह उनकी अदाकारी की लगातार दूसरी दमदार पेशकश है। साई तथा राधिका ने अपने-अपने चरित्र से पूरा न्याय किया है, वहीं दिलीप के किरदार में सागर देशमुख असरदार हैं। पारुल की भूमिका में वीरा सक्सेना भी अपनी मौजूदगी दर्ज़ कराती हैं। लब्बो-लुआब यह कि हंटर एक वयस्क किंतु मनोरंजक फ़िल्म है, जिसका हम अपने हमउम्र लोगों के साथ यक़ीनन मज़ा ले सकते हैं।