साल का अब तक का बेहतरीन तोहफा

फिल्मकार आर. बाल्की की जादुई पोटली एक बार फिर खुली है, और इस बार इसमें से पूरी शानो-शौकत तथा ढोल-धमाके के साथ निकली है शमिताभशमिताभ में डबल डोज़ है; यह दानिश और अमिताभ का संगम के तौर पर सामने आती है। डबल डोज़, यानी डबल मज़ा। लेकिन यहां मज़ा कई गुणा है। अब आप पूछेंगे कि कैसे? तो जवाब यह है कि शमिताभ का हर पहलू जानदार है- इसकी अवधारणा से लेकर कथानक की बुनावट तक, पटकथा से लेकर संवादों तक, अभिनय से लेकर संगीत तक। आप सचेत होकर खामी निकालने बैठेंगे तो एक अच्छी पेशकश का मजा लेने का मौका जाता रहेगा। ...और फिल्म देखने के बाद जब अवचेतन मस्तिष्क को खंगालेंगे तो फिल्म की बहुत-सी खूबसूरत बातों का मिश्रण चेहरे पर मुस्कान तथा मन में संतुष्टि का भाव ला देगा।
      शमिताभ का जब ट्रेलर जारी हुआ था तो इसके धीमी रफ्तार से चलने वाली एक बोझिल-सी फिल्म होने का अक्स जहन में बना था। लेकिन शमिताभ जब अपने पूरे आकार में सामने आती है तो रूह को खुश करती है। फिल्मी दुनिया में मुकाम बनाने का जुनून पाले एक गूंगे लड़के दानिश की आवाज अमिताभ सिन्हा नामक एक असफल अभिनेता के बनने और फिर उनके अहम आपस में टकराने को रेखांकित करती शमिताभ शुरुआती तेजी के बाद बहुत जगह धीमी भी होती है, लेकिन यह फिल्म की सहज-स्वाभाविक गति है। 
      गूंगे दानिश के किरदार में धनुष इस कदर समाये हैं कि एक समय बाद उन्हें किसी दूसरे की आवाज में बोलते देखना अटपटा लगता है; तो वहीं पकी दाढ़ी वाले और शराबी हो चुके एक कुंठित कलाकार अमिताभ सिन्हा के किरदार में रचे-बचे अमिताभ बच्चन को आप परदे से ओझल होते नहीं देखना चाहते हैं। एक समय बाद आपको दानिश से हमदर्दी होने लगती है और यही एक कलाकार के तौर पर धनुष और लेखक-निर्देशक के तौर पर आर. बाल्की की जीत भी है। 
      अमिताभ का अभिनय जहां अभिभूत करता हैं, वहीं कहीं अवचेतन में आप यह भी सोचते हैं कि इस उम्र में अमिताभ अपने विविध किरदारों के जरिये जिस मोहपाश में हमें जकड़े जा रहे हैं, वह उस आकर्षण से अलग है जो सत्तर-अस्सी के दशक में तब बनना शुरू हुआ था जब उन्हें कमोबेश एक जैसे किरदार निभाने को मिल रहे थे। इन दोनों के अलावा, कमलहासन तथा सारिका की छोटी बेटी अक्षरा उन उम्मीदों को पूरा करती नजर आती है, जो उनकी बड़ी बहन श्रुति से लगाई गई थीं और जिनके पूरा होने का अभी इंतजार है। एक चुलबुली असिस्टेंट डायरेक्टर की भूमिका में अक्षरा अपनी सहजता एवं आत्मविश्वास से अचंभित करती हैं। कब्रिस्तान में अमिताभ सिन्हा के साथी के तौर पर अजय जाधव आपको हंसाते हैं और दर्शक के जहन में अपनी जगह बना लेते हैं। उनका अभिनय स्वाभाविक है और मौजूदगी असरदार।
      शमिताभ का गीत-संगीत भी जानदार है। अमिताभ की आवाज में पिडली-सी बातें... गुदगुदाता है, तो वहीं कारालिसा मोन्टीरो की आवाज में श श श श मी मी मी मी... ताजा हवा के झोंके की तरह लगता है। वैसे, शमिताभ की खूबसूरती इसके कथानक के नयेपन, हर पहलू को तराशने के साथ ही उनकी शानदार पैकेजिंग और इसकी मासूम किंतु दमदार पेशकश में है। इसमें आप किसी बहुत गहरे संदेश को तलाशने जाएंगे तो निराश होंगे। संदेश अगर है तो सिर्फ इतना कि अकेले हम अधूरे ही रहते हैं  हम संपूर्ण कभी नहीं हो सकते; आगे बढ़ने के लिए अपनी काबिलियत के साथ हमें दूसरों का योगदान भी चाहिए होता है; यदि दूसरों की भूमिका को अनदेखा कर हम इस मुगालते में जीने लगते हैं कि हमें किसी की जरूरत नहीं तो हम अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। वैसे, बेहद दार्शनिक होने के बजाय अगर शमिताभ को आप इस नजर से देखेंगे कि यह एक काल्पनिक कथ्य है जिसे बयान करने तथा जिसमें जज्बात पिरोये जाने में पूरी ईमानदारी बरती गई है, तो यकीन मानिए बहुत आनंद आएगा। 

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