भागते-भागते दूसरे हाफ़ में हांफ गई ‘जॉन डे’

ज्ञानी लोग कहते हैं कि जब मौत सिर मंडरा रही हो तब इन्सान को ज़िंदगी के असल मायने समझ आते हैं, कितनी ही चीज़ें उसे बेमानी लगने लगती हैं और जीवन भर किए अपने ग़लत कामों पर उसे पछतावा महसूस होता है। इन्सान भ्रम के कितने भी चश्मे लगाए चलता रहे, मरते वक़्त उसके सामने सारी तस्वीर साफ़ हो जाती है। मौत से पहले के कुछ ऐसे ही पल उसे मुक्ति दिला जाते हैं।
      अहिशोर सोलोमन की निर्देशक के रूप में पहली फ़िल्म जॉन डे का कथानक आम कहानियों जैसा नहीं है कि जिसका कोई तार्किक अंत होता हो। यह फ़िल्म एक स्टोरीलाइन की घटनाओं का चित्रण भर है, लेकिन एक अनकहे सवाल के साथ ज़रूर ख़त्म होती है कि हम जिस सत्य को मरते समय समझकर मुक्ति का अहसास पा जाते हैं (जैसा कि फ़िल्म का एक किरदार ख़ान साहब कहता भी है), उस मोक्ष की स्थिति को हम जीते-जी महसूस क्यों नहीं कर सकते? अंतर केवल अपने अदंर के जानवर को ख़त्म करके एक इन्सान होकर सोचने का ही तो है।
      फ़िल्म जॉन डे इसी नाम के एक ऐसे आम इन्सान (नसीरुद्दीन शाह) के बदले की कहानी है जिसे पता चलता है कि उसकी बेटी की मौत हादसा नहीं थी, बल्कि चंद लोगों के लालच का नतीज़ा थी। बदले की इस राह में उसका टकराव एक भ्रष्ट पुलिस अफ़सर गौतम (रणदीप हुडा) से होता है जो बचपन में ही अनाथ होने के बाद एक ऐसे व्यक्ति का शिकार होता है जिस पर वह भरोसा करता है। बड़ा होने के दौरान वह ख़ुद को जानवर बनाता जाता है, लेकिन अपने अंदर के इन्सान को मारने में सफल नहीं हो पाता। फ़िल्म में यह स्थिति गौतम की ही नहीं, हर उस इन्सान की है जो ग़लत रास्ता अख़्तियार किए हुए है।
      कहानी के अलग-अलग मोड़ों पर लालच, लालसा एवं धोखे का चित्रण है। पहले हाफ़ में फ़िल्म ने अपनी रफ़्तार बनाए रखी है, लेकिन दूसरे हाफ़ में आकर यह हांफने लगती है। अहिशोर ने अपनी इस फ़िल्म में बहुत ज़्यादा ख़ून-ख़राबा दिखाया है, कई जगह वीभत्स दृश्यों को रखा है। ताज्जुब होता है कि अच्छी फ़िल्म बनाने की राह पर चलते-चलते कोई फ़िल्मकार कैसे अचानक लड़खड़ा सकता है, कैसे वो ऐसी ग़लतियां कर जाता है! क्या वह फ़िल्म को एक दर्शक होकर नहीं देख पाता? जिन लोगों को परदे पर थोड़े-थोड़े वक़्त बाद ख़ून बिखरते देख उबकाई आती हो, उनके लिए इस फ़िल्म से दूर रहना ही बेहतर होगा।
      इस फ़िल्म को आप इसके अंतर्निहित संदेश के अलावा नसीरुद्दीन शाह तथा रणदीप के लिए देख सकते हैं। नसीर अगर कमाल हैं, तो वहीं उनके शिष्य रणदीप ने अपने गुरु का मुक़ाबला करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। बॉम्बे टॉकीज़ के बाद रणदीप की यह लगातार दूसरी बेहतरीन परफॉरमेंस हैं। साथ ही यह भी कि लगातार दूसरी फ़िल्म में उनका पुरुष के साथ होंठ-से-होंठ मिलाने का दृश्य है (हालांकि इस बार मंतव्य अलग है)। इलीना कज़ान के पास शराब पीने के अलावा कुछ करने को नहीं था और जो करने को दिया भी गया उसमें भी वह असफल रही हैं। विपिन शर्मा तथा शरत सक्सेना अपनी-अपनी भूमिकाओं में बढ़िया नज़र आए हैं। फ़िल्माकंन के दृष्टि से यह फ़िल्म औसत ही कही जाएगी। कुल मिलाकर यही कि अगर अहिशोर वीभत्सता दिखाने से बच जाते तो फ़िल्म का स्तर थोड़ा ऊंचा हो जाता।

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5 comments:

dr mrunalinni said...

yeh bhi gayi kaam se will skip this one too i want to releish shudhdesiromance lagta hai wahi dubaara dekhna weekend ke liye achha rahega..aap sakartmak roop se vishleshan karte hai film ka sirf teeka nahi ajay well written.

ब्लॉग - चिठ्ठा said...

आपके ब्लॉग को ब्लॉग संकलक ब्लॉग - चिठ्ठा में शामिल किया गया है। सादर …. आभार।।

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savan kumar said...

अच्छीं समीक्षा सेकिन फिल्म नहीं देखी हैं अभी तक
http://savanxxx.blogspot.in