अपने भीतर की यात्रा है ‘शिप ऑफ थिसियस’

शुरूआत इसके नाम से करते हैं। शिप ऑफ थीसियसएक विरोधाभास है, जो लंबे समय से दर्शनशास्त्रियों के बीच बहस का विषय रहा है। बहस इस बात पर कि किसी चीज़ का एक हिस्सा बदल देने से वह चीज़ वास्तविक रह पाती है या नहीं। अपनी इस फ़िल्म में फ़िल्मकार आनंद गांधी इस विरोधाभास पर चलने वाली बहस से आगे बढ़ते हुए इसे नैतिकता के तकाज़े तक ले गए हैं। फ़िल्म के ज़रिये आनंद सवाल उठाते हैं कि अगर शरीर का कोई अंग बदल दिया जाए तो क्या हम पहले जैसा इन्सान रह जाते हैं? या इसे यूं कहें कि क्या हम अवास्तविक होने से बचे रह पाते हैं? फ़िल्म में यह सवाल परदे पर ही नहीं रहता, यह देखने वाले में गहरे उतरता जाता है। फ़िल्म आपके दिलो-दिमाग़ में रिसती जाती है और इस सवाल के लिए आप आनंद का शुक्रगुज़ार हुए बिना नहीं रह पाते।
      फ़िल्म में तीन कहानियां हैं जिनके लिए यह विरोधाभास एक निराकार सूत्रधार की तरह है। अंत से कुछ समय पहले तक ये कहानियां एक दूसरे से अलग ज़रूर लगती हैं, लेकिन जिस तार्किक तरीके से सब बातों को दृश्यों एवं संवादों के माध्यम से सामने रखा जा रहा है उसे देखकर इतना अंदाज़ा तो हो ही जाता हैं कि यह समझदार फ़िल्मकार अंत में इन कहानियों को एक-दूसरे में विलीन नहीं करने का अतार्किक रास्ता कतई नहीं अपनाएगा। तीनों कहानियां मुंबई की हैं, तीनों के पात्र अंत में जुड़ते जरूर हैं, पर तीनों के संसार अलग-अलग हैं। ...और यह भी कि तीनों कहानियां इस विरोधाभास से जुड़े अलग-अलग सवालों को छूकर निकलती हैं।
      पहली कहानी इसके मूल तत्व को उभारती है कि एक अंग बदल देने से हम वह नहीं रह पाते जो पहले थे। तीसरी कहानी में आनंद इस बहस को नैतिकता की कसौटी पर ले गए हैं कि एक चीज़ को बचाने के लिए क्या हमें दूसरी चीज़ का हिस्सा काटकर उसमें लगा देना चाहिए? फ़िल्म की दूसरी कहानी का सार एथेंस के पौराणिक सम्राट थिसियस का समुद्रपोत बचे रहने की वजह के सबसे क़रीब है। यह कहानी सवाल छोड़ती है कि अगर कोई वस्तु ख़त्म होने की तरफ बढ़ती जा रही है तो उसके हिस्सों को बदलकर उसे क्यों न बचाया जाए? और अगर यह बात किसी वस्तु के लिए तर्कपूर्ण है तो एक इन्सान के लिए क्यों नहीं! आखिर जीवन से बढ़कर सत्य तो कुछ भी नहीं!
      विचार संबंधी इन सब विशेषताओं के अलावा शिप ऑफ थीसियस कारीगरी की कसौटी पर भी कहीं आगे हैं। आनंद ने फ़िल्म में विज्ञान के किसी छात्र की तरह दृश्यों की डिटेल्स कैमरे में क़ैद की हैं। वहीं दृश्यों से बिना तकनीकी छेड़छाड़ के उन्हें जस-का-तस पेश करना वास्तविक दुनिया में होने के अहसास को बनाए रखता है। सूरज ढलने से उगने तक के दृश्यों में धुंधलापन अखरता नहीं बल्कि ताज़गी देता है। इसके अलावा, फ़िल्म देखते वक्त कानों तक आती महीन-से-महीन ध्वनियां आपको असल दुनिया में बनाए रखती हैं। फ़िल्म के अंत में अंगदान करने वाले इन्सान की महज़ छाया दिखाना भावार्थ की पेशकश के हिसाब से एक अद्भुत प्रयोग है। वह व्यक्ति अब इस दुनिया में नहीं है, मगर उसकी छाया शाश्वत है जो अंगों को हासिल करने वाले सभी लोगों के मन-मस्तिष्क पर जीवनभर बने रहने वाली है। वे कहीं भी जाएंगे, उस छाया से अलग नहीं हो पाएंगे। अभिनय के लिहाज से भी शिप ऑफ थीसियस कमाल की पेशकश है। आलिया की भूमिका में मिस्री अभिनेत्री ऐदा अल-कासिफ, मैत्रेय के किरदार में नीरज कबि और नवीन की भूमिका में सोहम शाह विस्मित करते हैं। इन तीन मुख्य कलाकारों के अलावा चार्वक की भूमिका में विनय शुक्ला और मन्नू के किरदार में समीर खुराना भी असरदार रहे हैं।
      यह ज़रूर है कि 140 मिनट की इस फ़िल्म को छोटा किया जा सकता था। इल्ली के पैरों के नीचे दबने से बचने का दृश्य हो, या फिर रात से दिन होना दर्शाने के लिए खेत में झूमती फ़सल का दृश्य... इनमें कंजूसी बरती जाती तो भी चल जाता। शायद आनंद डिटेल्स को दिखाने की रौ में बह गए हैं। फिर भी, पारंपरिक मसालेदार सिनेमा देखने के आदी भारतीय दर्शकों के समक्ष एक अलग तरह का सिनेमा पेश करने की एक युवा फ़िल्मकार की यह खरी कोशिश है। यह फ़िल्म हमारा सामना ख़ुद से तो कराती ही है, एक पुख़्ता असर छोड़े बिना भी नहीं रहती है।

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1 comments:

कविता रावत said...

शिप ऑफ थीसियस’ के बारे में बहुत बढ़िया समीक्षा प्रस्तुति के लिए धन्यवाद