हल्की-फुल्की कॉमेडी का ढोल ‘बजाते रहोsss’

मेहनत और ईमानदारी से गुज़र-बसर कर रहे एक आम मिडल-क्लास परिवार को अगर किसी दूसरे की बेईमानी और बदनीयती का दंश झेलना पड़े और फिर इसकी कीमत उसे सम्मान एवं जान देकर चुकानी पड़े, तो कोई भी इन्सान वही करेगा जो बजाते रहोमें बावेजा परिवार के लोग करते हैं। दिल्ली की एक मध्यमवर्गीय बस्ती की पृष्ठभूमि पर रचे गए इस कथानक में प्यार है, दोस्ती है, झगड़ा है, ख़ुद्दारी है, लालच है, बदला है....और सबसे ख़ास बात इसमें ईमानदारी से चित्रित की गई इन्सानी कमज़ोरियां हैं। इन सब मानवीय विशिष्टताओं के ताने-बाने के नीचे हास्य की धीमी धारा लगातार बहती जाती है। ऐसा हास्य जो आपको ठठाकर नहीं हंसाता, पर मुस्कराने को मजबूर ज़रूर करता है। जैसे को तैसा की सोच के तहत बदला लिए जाने की युक्तियां बेशक कई जगह अव्यावहारिक लगें, लेकिन उनके पीछे का कच्चापन ही दर्शक को गुदगुदाहट दे जाता है। उसे परदे पर चलता घटनाक्रम परिचित-सा लगता है और वह किसी-न-किसी किरदार में ख़ुद को तलाश ही लेता है।
      कुल 107 मिनट की बजाते रहोइस मामले में विशेष है कि इसमें किसी भी पात्र को सुपर हीरो नहीं दिखाया गया है। अपने चरित्र में नायक तत्व को समेटे इसके सभी पात्र आप और मेरे जैसे हैं। वे सांचे में ढले आदर्श पात्र नहीं हैं; वे नैतिकता का भोंपू बजाते नहीं घूमते और ग़लत होने के बावजूद उनकी कारगुज़ारियों को आप न्यायसंगत करार देते हैं। कथानक में स्थितियां ऐसी बनती हैं जिनसे हम ज़िंदगी में कहीं-न-कहीं दो-चार होते ही हैं। मोहब्बत है तो उसमें चांद-सितारों की बातें नहीं हैं। इसका खलनायक भी आम व्यक्ति से अलग नहीं है। वह रोमांटिक होता है, बेटी की शादी के लिए डांस सीखता है, लड़के वालों के आगे भीगी बिल्ली बना रहता है, अपने आस-पास गुंडों की फौज भी नहीं पाले हुए है।
      पटकथा में स्थितियों एवं किरदारों का यही खरापन आपको भाता है; इस वजह से फ़िल्म कहीं पर भारी भी नहीं लगती है। इसमें हास्य परिस्थितिजन्य है और अगर कुछेक चुटकले भी हैं तो फिर उन्हें चुटकुले कहकर ही पेश किया गया है, संवाद बनाकर नहीं। बीच-बीच में फ़िल्मकार बिना डुगडुगी बजाए सामाजिक तौर पर होते जा रहे हमारे पतन पर कटाक्ष भी कर गया है। जागरणों में भजनों का फ़िल्मी गीतों का मोहताज हो जाने और इन जागरणों को केवल गाने-बजाने का मौका मानने की हमारी सोच पर मनोरंजक तरीके से प्रहार किया गया है।
      हालांकि, निर्देशक शशांत ए. शाह की पहली दो फ़िल्मों दसविदानिया तथा चलो दिल्ली की तरह यह फ़िल्म आपको लगातार बांधकर नहीं रखती है। उन फ़िल्मों जैसा चुंबकीय तत्व बजाते रहो से ग़ायब है। दूसरे, पहली दो फ़िल्मों के उलट शशांत इस फ़िल्म में दर्शक के लिए हर मोड़ पर जिज्ञासाऔर अंत के लिए कोई अचरज बचाकर नहीं रखते हैं। दसविदानिया में जिज्ञासा यह रहती है कि क्या नायक ज़िंदगी के बचे हुए तीन महीनों में सभी दस इच्छाएं पूरी कर लेगा? और अगर करेगा भी तो कैसे करेगा? वहीं, चलो दिल्ली के खुशमिज़ाज नायक के बारे में दर्शक अंत में जाकर ही जान पाता है कि वह असल में कितना दुःख समेटे हुए है। लेकिन बजाते रहोमें शुरू से ही तय है कि खलनायक की आखिरकार बजने वाली है। सवाल यही रहता है कि कैसे बजनी है
      यह ज़रूर है कि इस कैसे के दौरान नोटों से भरा बैग उठाने के लिए नकली बमदस्ते का पहुंचना दर्शक को चार साल पहले आई दिवंगत पंकज आडवाणी की फ़िल्मसंकट सिटी में ले जाता है। इस दृश्य में शशांत फ़िल्म के लेखक से कुछ अलग करवा पाते तो बेहतर होता, क्योंकि फ़िल्म की अवधि इतनी छोटी है कि इसमें कुछ भी पुराना पेश कर देने की गुंजायश नहीं बनती है। वैसे शशांत उन फ़िल्मकारों में हैं जो अभी तक नया पेश करते रहे हैं और दर्शकों को उनसे आगे भी यही उम्मीद रहने वाली है।
      कलाकारों के अभिनय तथा उनके चयन की दृष्टि से यह फ़िल्म बहुत अच्छी कही जाएगी। अपने दमदार अभिनय के बल पर रविकिशन, डॉली अहलूवालिया, रणवीर शौरी और बृजेंद्र काला फिल्म में अलग खड़े नज़र आते हैं। तुषार, विशाखा सिंह, विनय पाठक और राजेंद्र सेठी भी अपने-अपने पात्र के हिसाब से जमे हैं। विनय पहली बार गंभीर भूमिका में हैं, तो विशाखा पहली बार चुलबुले किरदार में परदे पर आई हैं। खलनायक के रिश्तेदारों की भूमिकाओं में राजेंद्र नानू और विकास मोहला भी असर छोड़ते हैं। संगीत के नाम पर फ़िल्म में चार गीत हैं और चारों ही कर्णप्रिय हैं। यह एक पारिवारिक फ़िल्म है जो दिनभर के तनाव के बीच में से कुछ हल्के-फ़ुल्के पल चुराने का अच्छा ज़रिया साबित हो सकती है।

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