शानदार रस हैं ‘मद्रास कैफ़े’ के मेन्यू में!

मद्रास कैफ़ेके रिलीज़ से पहले इसके निर्देशक शुजित सरकार बार-बार कह रहे थे कि वास्तविकता के जितना क़रीब उनकी यह फ़िल्म लगेगी उतना हिंदी सिनेमा की इससे पहले शायद ही कोई स्पाई-पॉलिटिकल थ्रिलर फ़िल्म लगी होगी। ...और अब जब फ़िल्म परदे पर सबके सामने है तो इसे देखते समय शुजित की ईमानदारी का कायल हुए बिना आप नहीं रह सकते। इसका हर दृश्य यूं लगता है मानो 20 साल पीछे के सब हालात आपकी आंखों के सामने घटित हो रहे हों।
      श्रीलंका के गृहयुद्ध को आधार बनाकर रचे गए एक कथानक को सच के क़रीब ले जाकर परदे पर उतारना ही मद्रास कैफ़े की ख़ूबी कही जाएगी। हालांकि, फ़िल्म कोई पहलू ऐसा नहीं है जिसे अच्छे से मांज कर पेश न किया गया हो। क्या कोई सोच सकता है कि आज जिस हिंदी सिनेमा में बिना आइटम सॉन्ग के फ़िल्म बनाने की कल्पना करने तक की हिम्मत कोई फिल्मकार नहीं जुटा पा रहा हो और फ़िल्मों में हर कदम पर संवाद इस कदर ठूंसे जा रहे हों कि दर्शक को परदे पर चलती तस्वीरें समझने का मौका तक न मिले, वहां कोई ऐसी फ़िल्म भी देखने को मिल सकती है जिसमें केवल एक गीत हो और वह भी कहानी पूरी हो चुकने के बाद आए? ‘मद्रास कैफ़े ऐसी ही फ़िल्म है जो बताती है कि कैसे एक फ़िल्मकार केवल ख़ुद पर यकीन की ताक़त से एक शानदार पेशकश दे सकता है। मद्रास कैफ़ेएक ऐसी फ़िल्म है जो शब्दों के बजाय तस्वीरों के ज़रिये ज़्यादा बोलती है...और जब बोलती है तो आप चुपचाप इसका रसास्वादन करते जाते हैं।
      सैन्य कार्रवाइयों की नैतिकता पर सवाल उठाती यहां और फिर स्पर्म डोनेशन जैसे मुद्दे पर विकी डोनर जैसी फ़िल्में दे चुके शुजित के गुलदस्ते में मद्रास कैफ़े बेहतरीन संकलन कही जा सकती है। कहानी उस वक़्त के श्रीलंका की है जब वहां गृहयुद्ध चरम पर था। श्रीलंका सरकार से एक समझौते के तहत भारत ने वहां अपने शांति सैनिक भेजे थे और इसका ख़मियाजा भारत को अपने पूर्व प्रधानमंत्री को खोने के रूप में चुकाना पड़ा था। राजनीतिक एवं कूटनीतिक स्तर पर चलते विरोधाभासों के बीच रची जा रही एक साज़िश पर बुना गया यह कथानक सियासी महत्वाकांक्षाओं की चक्की में आम बेगुनाह नागरिकों के पिसने की सच्चाई को बेहद मार्मिक ढंग से उठाता है। कहानी का केंद्रीय किरदार एक रॉ एंजेट है जो अपना सबकुछ दांव पर लगाकर इस साज़िश से परदा उठाने के अभियान पर है। वह नायक नहीं है कि जिसके पहुंचते ही सारे पत्ते सीधे पड़ने लगें। इस अभियान में उसे निजी तौर पर भी कीमत चुकानी पड़ती है। वह साज़िश को बेनक़ाब तो करता है मगर उसे अंजाम तक पहुंचने से रोक नहीं पाता। यही वजह है कि वह एक सामान्य इन्सान जैसा नज़र आता है जो कोशिश तो कर रहा है लेकिन हालात को अपने हिसाब से मोड़ना उसके बस में नहीं।
      केंद्रीय किरदार का सच के इतना क़रीब दिखना और कहानी का एक ऐतिहासिक घटनाक्रम से प्रेरित होना जहां मद्रास कैफ़े को अलग बना जाता है, वहीं इस वजह से यह उन लोगों की फ़िल्म बनकर सामने आती है जो केवल मनोरंजन के लिए सिनेमाघरों का रुख़ नहीं करते बल्कि कुछ मानीखेज़ सिनेमा देखना चाहते हैं। यह फ़िल्म उन दर्शकों के लिए है जो कहानी में गहरे उतरकर बहुत-से अनकहे संदेशों को मन-ही-मन रेखांकित कर समझना चाहते हैं। कहानी के अलावा फ़िल्म के अन्य पहलुओं पर बात करें तो अभिनय, संवाद, कला निर्देशन, फ़िल्म सेट तथा सिनेमेटोग्राफ़ी... सब कमाल हैं। कलाकारों का चयन ऐसा है कि वे वास्तविक ज़िंदगी के पात्र लग रहे हैं। रॉ एंजेट विक्रम की भूमिका में जॉन अभिनय करियर के चरम पर हैं। क्या काम किया है उन्होंने! उन लोगों को जॉन का यह करारा जवाब होगा जो कहते रहे हैं कि जॉन केवल अपने शारीरिक सौष्ठव के बल पर फ़िल्मी दुनिया में बने हुए हैं। वहीं, युद्ध संवाददाता के रूप में नरगिस फाख़री, रॉ प्रमुख की भूमिका सिद्धार्थ बसु, रूबी की भूमिका में राशि खन्ना और बाला के किरदार में प्रकाश बेलावड़ी की भी परदे पर शानदार मौजूदगी है। जूही चतुर्वेदी के संवाद धारदार हैं और असर छोड़ते जाते हैं। वहीं, कमलजीत नेगी ने गृहयुद्ध के हालात को कैमरे में बेहतरीन तरीके से क़ैद करने के अलावा इंटरकट्स का जिस ख़ूबसूरती से फिल्मांकन किया है, वह एक भारी फ़िल्म में भी आपको सुकून दे जाता है। फ़िल्म देखकर आने के बाद दर्शक निश्चित तौर पर कमलजीत नेगी के काम को लंबे समय तक नहीं भूल पाएगा।

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