यातना के सिवा कुछ और नहीं है ‘इसक’
पहले कुछ सवाल....! क्या बनारसी होने का मतलब केवल ख़ून-ख़राबा करना और बात-बात पर बंदूक निकाल लेना है? क्या बनारस और आस-पास के इलाक़ों में नक्सली हथियार लहराते हुए खुले घूमते हैं और ‘लाल सलाम, लाल सलाम’ का उद्घोष करते नौकाओं में बैठ कहीं भी बेरोक-टोक आ–जा सकते हैं? क्या हमारी कानून-व्यवस्था इतनी कुंद पड़ गई है कि भारत का एक तहज़ीब वाला शहर यूं लगे मानो हम सोमालिया के जलदस्युओं के अधिकार-क्षेत्र में हों? क्या नक्सल सरदार इतने मूढ़ होते हैं कि रेत के खनन का अधिकार देने के एक इंस्पेक्टर जैसे नगण्य अधिकारी के वायदे पर एक भरी-पूरी ख़ूनी जंग छेड़ देते हैं? क्या बनारस में स्पाइरमैन पाया जाता है जो कहीं भी चढ़-उतर सकता है, छलांग लगाकर एक घर से दूसरे घर में पहुंच जाता है? क्या यह स्पाइडरमैन जब दुश्मन परिवार की छत पर पहुंचता है तो एच.जी. वेल्स का ‘इनविज़िबल मैन’ हो जाता है? क्या शिव की नगरी काशी में कामदेव एक इन्सान के रूप में अवतार ले चुके हैं जो नशे की हालत में एक चुंबन का तीर चलाकर ही नायिका को अपना बना लेते हैं? अगर आप इन सवालों के जवाब हर हाल में ‘हां’ में चाहते हैं तो ‘इसक’ देख आइए।
चलिए, इन सवालों को ‘गोली’ मार देते हैं, फ़िल्म की रेसिपी पर कुछ बात करते हैं। अगर आपने ‘इशक़ज़ादे’ देखी है तो उसमें नक्सली एंगल भी डाल दीजिए...आपके सामने ‘इसक़’ आ जाएगी। लेकिन ‘इसक़’ को परिभाषित करना इतना आसान नहीं है। ‘इशक़ज़ादे’ में जहां कारीगरी की छाप थी और दो परिवारों की लड़ाई के बीच फंसे प्रेमी युगल के भावनात्मक उतार-चढ़ाव को उम्दा तरीक़े से पेश किया गया था, वहीं ‘इसक़’ में कुछ हटकर पेश करने की कोशिश ही इसे काल के मुंह में डाल गई है। कितने ही मसाले इस क़दर ठूंस दिए गए हैं कि इसमें इश्क़ के लिए तो जगह ही नहीं बची। आप एक सिरे को छूने की कोशिश कर ही रहे होते हैं कि दूसरी डोर लटकती नज़र आ जाती है। क्या फ़िल्म में चुप्पी की भाषा का इस्तेमाल करना संवैधानिक तौर पर वर्जित था? लगता कुछ ऐसा ही है। यूं इस फ़िल्म में किरदार कहीं चुप ही नहीं होते हैं...और अगर कहीं ग़लती से ख़ामोश होते भी हैं तो उन रिक्त स्थानों को गोलियों की तड़-तड़ से भर दिया गया है। क्या आप ‘गैंग्स ऑफ़ वासीपुर’ से प्रभावित हैं? अगर हैं तो भी कोई बात नहीं, लेकिन वैसा कुछ करने से पहले अनुराग की समझ भी तो ले आइए।
दिवंगत स्मिता पाटिल जैसी आला दर्ज़े की अभिनेत्री के बेटे प्रतीक बब्बर के लिए यह फ़िल्म एक बड़ा मौक़ा हो सकती थी। लेकिन वह कहीं ठहरते ही नहीं है...पानी में घुलकर मानो विलीन हो गए हैं। अमायरा दस्तूर का अभिनय ऐसा है जैसे नेपथ्य में बैठकर संवाद याद कर रही हों। उनकी केवल मुस्कराहट देखने लायक है। नीना गुप्ता और सुधीर पांडेय की काबिलियत का इस्तेमाल नहीं हुआ है। अगर फ़िल्म में कुछ है तो वो तीतस की भूमिका में रविकिशन हैं। कितना दम लगाया उन्होंने, पर एक घटिया स्क्रिप्ट के आगे उनकी एक न चली। पारो के किरदार में राजेश्वरी सचदेव ने भी रवि की कोशिश में बेहतरीन साथ दिया है। नक्सली सरदार बने प्रशांत नारायणन और बाबा की भूमिका में मकरंद देशपांडे की अच्छी कोशिश भी बेकार चली गई है।
इस उलझी हुई फ़िल्म को समझ पाना जितना मुश्किल है, उतना ही मुश्किल इसकी व्याख्या करना है। पूरी फ़िल्म यूं लगती है मानो किसी नौसिखिया बहू को दाल, चावल, आटा, नमक तथा सारे मसाले देकर रसोईघर में धकेल दिया गया हो और उसने सबकुछ मिलाकर एक ऐसा व्यंजन तैयार कर दिया हो जो न निगलते बने न उगलते बने। फ़िल्म देखते हुए दस मिनट भी नहीं गुज़रते कि आप सोच में पड़ जाते हैं कि आख़िर फ़िल्मकार दिखाना क्या क्या चाह रहा है। कुछ देर बाद आप उसकी मंशा को लेकर ख़ुद से सवाल करते हैं कि क्या उसकी दर्शक को पकाने की तमन्ना है। आधे समय तक आपको समझ आने लगता है कि वह दर्शक को यातना देने का फ़ैसला करके आया है। ...और फिर आख़िर तक आते-आते आप यह सोचकर उसे धन्यवाद अर्पित करने से ख़ुद को रोक नहीं पाते हैं कि अगर ऐसी फ़िल्में नहीं आएंगी तो हम अच्छी फ़िल्मों की पहचान कैसे कर पाएंगे।
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Alas......